महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2168, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंविद्याधराश्च ये सिद्धा भूतास्तारागणास्तथा ।
पुष्पवृष्टिं च वर्षन्ति प्रनृत्यन्ति च हर्षिताः ॥
‘देवता, पितर, गन्धर्व, अप्सराएँ, लोक, द्वीप, समुद्र, गंगा आदि नदियाँ तथा अंगों और यज्ञोंसहित सम्पूर्ण वेद नाना प्रकारके मन्त्रोंसे कपिला गौकी प्रसन्नतापूर्वक स्तुति किया करते हैं। विद्याधर, सिद्ध, भूतगण और तारागण—ये कपिला गौको देखकर फूलोंकी वर्षा करते और हर्षमें भरकर नाचने लगते हैं’ ॥
ब्रह्मणोत्पादिता देवी वह्निकुण्डान्महाप्रभा ।
नमस्ते कपिले पुण्ये सर्वदेवैर्नमस्कृते ॥
कपिलेऽथ महासत्त्वे सर्वतीर्थमये शुभे ।
‘वे कहते हैं—‘सम्पूर्ण देवताओंसे वन्दित पुण्यमयी कपिलादेवी! तुम्हें नमस्कार है। ब्रह्माजीने तुम्हें अग्निकुण्डसे उत्पन्न किया है। तुम्हारी प्रभा विस्तृत और शक्ति महान् है। कपिलादेवी! समस्त तीर्थ तुम्हारे ही स्वरूप हैं और तुम सबका शुभ करनेवाली हो’ ॥
अहो रत्नमिदं पुण्यं सर्वदुःखघ्नमुत्तमम् ।
अहो धर्मार्जितं शुद्धमिदमग्र्यं महाधनम् ॥
इत्याकाशस्थितास्ते तु सर्वदेवा जपन्ति च ॥
‘समस्त देवता आकाशमें खड़े होकर कहा करते हैं—‘अहो! यह कपिला गौरूपी रत्न कितना पवित्र और कितना उत्तम है! यह सब दुःखोंको दूर करनेवाला है। अहा! यह धर्मसे उपार्जित, शुद्ध, श्रेष्ठ और महान् धन है’ ॥
युधिष्ठिर उवाच
देवदेवेश दैत्यघ्न कालः को हव्यकव्ययोः ।
के तत्र पूजामर्हन्ति वर्जनीयाश्च के द्विजाः ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**दैत्योंके विनाशक देवदेवेश्वर! हव्य (यज्ञ) और कव्य (श्राद्ध)-का उत्तम समय कौन-सा है? उसमें किन ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिये और किनका परित्याग? ॥
श्रीभगवानुवाच
दैवं पूर्वाह्निकं ज्ञेयं पैतृकं चापराह्निकम् ।
कालहीनं च यद् दानं तद् दानं राजसं विदुः ॥
**श्रीभगवान्ने कहा—**युधिष्ठिर! देवकर्म (यज्ञ) पूर्वाह्नकालमें करने योग्य है और पितृकर्म (श्राद्ध) अपराह्नकालमें—ऐसा समझना चाहिये। जो दान अयोग्य समयमें किया जाता है, उस दानको राजस माना गया है ॥
अवघुष्टं च यद् भुक्तमनृतेन च भारत ।
परामृष्टं शुना वापि तद् भागं राक्षसं विदुः ॥