महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाषायदण्डधारोऽपि यतिः पूज्यो न संशयः ।। संन्यासी एक दण्ड धारण करनेवाला हो या तीन दण्ड, बड़ी-बड़ी जटाएँ रखता हो या माथा मुँडाये रहता हो अथवा गेरुआ वस्त्र पहननेवाला हो, निःसंदेह उसका सत्कार करना चाहिये ।।
तस्मात् तु यत्नतः पूज्या मद्भक्ता मत्परायणाः । मयि संन्यस्तकर्माणः परत्र हितकाङ्क्षिभिः ।। इसलिये जो परलोकमें अपना कल्याण चाहते हों, उन पुरुषोंको उचित है कि वे मुझमें समस्त कर्मोंका अर्पण करनेवाले मेरे शरणागत भक्तोंका यत्नपूर्वक सत्कार करें ।।
प्रहरेन्न द्विजान् विप्रो गां न हन्यात् कदाचन । भ्रूणहत्यासमं चैव उभयं यो निषेवते ।। ब्राह्मणोंपर हाथ न छोड़े और गायको कभी न मारे। जो ब्राह्मण इन दोनोंपर प्रहार करता है, उसे भ्रूणहत्याके समान पाप लगता है ।।
नाग्निं मुखेनोपधमेन्न च पादौ प्रदापयेत् । नाधः कुर्यात् कदाचित् तु न पृष्ठं परितापयेत् ।। अग्निको मुँहसे न फूँके, पैरोंको आगपर न तपावे और आगको पैरसे न कुचले तथा पीठकी ओरसे अग्निका सेवन न करे ।।
श्वचण्डालादिभिः स्पृष्टो नाङ्गमग्नौ प्रतापयेत् । सर्वदेवमयो वह्निस्तस्माच्छुद्धः सदा स्पृशेत् ।। जो मनुष्य कुत्ते या चाण्डालसे छू गया हो, उसे अपना अंग अग्निमें नहीं तपाना चाहिये; क्योंकि अग्नि सर्वदेवतारूप है। अतः सदा शुद्ध होकर उसका स्पर्श करना चाहिये ।।
प्राप्तमूत्रपुरीषस्तु न स्पृशेद् वह्निमात्मवान् । यावत् तु धारयेद् वेगं तावदप्रयतो भवेत् ।। मल या मूत्रकी हाजत होनेपर बुद्धिमान् पुरुषको अग्निका स्पर्श नहीं करना चाहिये, क्योंकि जबतक यह मल-मूत्रका वेग धारण करता है, तबतक अशुद्ध रहता है ।।
युधिष्ठिर उवाच
कीदृशाः साधवो विप्रास्तेभ्यो दत्तं महाफलम् । कीदृशेभ्यो हि दातव्यं तन्मे ब्रूहि जनार्दन ।। युधिष्ठिरने पूछा— जनार्दन! जिनको दान देनेसे महान् फलकी प्राप्ति होती है, वे श्रेष्ठ ब्राह्मण कैसे होते हैं तथा किस प्रकारके ब्राह्मणोंको दान देना चाहिये? यह मुझे बताइये ।।
श्रीभगवानुवाच
अक्रोधनाः सत्यपरा धर्मनित्या जितेन्द्रियाः ।