महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 218, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीयं च चतुर्थं च पञ्चमं चानिलाशनः । एकपादेन तिष्ठंश्च ऊर्ध्वबाहुरतन्द्रितः ॥ ३८१ ॥ तीसरे, चौथे और पाँचवें महीनेमें मैं दोनों बाँहें ऊपर उठाये एक पैरसे खड़ा रहा। आलस्यको अपने पास नहीं आने दिया। उन दिनों वायुमात्र ही मेरा आहार रहा ॥ ३८१ ॥
तेजः सूर्यसहस्रस्य अपश्यं दिवि भारत । तस्य मध्यगतं चापि तेजसः पाण्डुनन्दन ॥ ३८२ ॥ इन्द्रायुधपिनद्धाङ्गं विद्युन्मालागवाक्षकम् । नीलशैलचयप्रख्यं वलाकाभूषिताम्बरम् ॥ ३८३ ॥ भारत! पाण्डुनन्दन! छठे महीनेमें आकाशके भीतर मुझे सहस्रों सूर्योंका-सा तेज दिखायी दिया। उस तेजके भीतर एक और तेजोमण्डल दृष्टिगोचर हुआ, जिसका सर्वांग इन्द्रधनुषसे परिवेष्टित था। विद्युन्माला उसमें झरोखेके समान प्रतीत होती थी। वह तेज नील पर्वतमालाके समान प्रकाशित होता था। उस द्विविध तेजके कारण वहाँका आकाश बकपंक्यितोंसे विभूषित-सा जान पड़ता था ॥ ३८२-३८३ ॥
तत्र स्थितश्च भगवान् देव्या सह महाद्युतिः । तपसा तेजसा कान्त्या दीप्तया सह भार्यया ॥ ३८४ ॥ उस नील तेजके भीतर महातेजस्वी भगवान् शिव तप, तेज, कान्ति तथा अपनी तेजस्विनी पत्नी उमादेवीके साथ विराजमान थे ॥ ३८४ ॥
रराज भगवांस्तत्र देव्या सह महेश्वरः । सोमेन सहितः सूर्यो यथा मेघस्थितस्तथा ॥ ३८५ ॥ उस नील तेजमें पार्वती देवीके साथ स्थित हुए भगवान् महेश्वर ऐसी शोभा पा रहे थे मानो चन्द्रमाके साथ सूर्य श्याम मेघके भीतर विराज रहे हों ॥ ३८५ ॥
संहृष्टरोमा कौन्तेय विस्मयोत्फुल्ललोचनः । अपश्यं देवसंघानां गतिमार्तिहरं हरम् ॥ ३८६ ॥ कुन्तीनन्दन! जो सम्पूर्ण देवसमुदायकी गति हैं तथा सबकी पीड़ा हर लेते हैं, उन भगवान् हरको जब मैंने देखा, तब मेरे रोंगटे खड़े हो गये और मेरे नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे ॥ ३८६ ॥
किरीटिनं गदिनं शूलपाणिं व्याघ्राजिनं जटिलं दण्डपाणिम् । पिनाकिनं वज्रिणं तीक्ष्णदंष्ट्रं शुभाङ्गदं व्यालयज्ञोपवीतम् ॥ ३८७ ॥ भगवान्के मस्तकपर मुकुट था। उनके हाथमें गदा, त्रिशूल और दण्ड शोभा पाते थे। सिरपर जटा थी। उन्होंने व्याघ्रचर्म धारण कर रखा था। पिनाक और वज्र भी उनकी शोभा