भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2181, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2181

श्रीभगवानुवाच

अन्नेन धार्यते सर्वं जगदेतच्चराचरम् । अन्नात् प्रभवति प्राणः प्रत्यक्षं नास्ति संशयः ॥ श्रीभगवान् बोले— राजन्! समस्त चराचर जगत् अन्नके ही आधारपर टिका हुआ है। अन्नसे प्राणकी उत्पत्ति होती है, यह बात प्रत्यक्ष है; इसमें संशय नहीं है ॥

कलत्रं पीडयित्वा तु देशो काले च शक्तितः । दातव्यं भिक्षवे चान्नमात्मनो भूतिमिच्छता ॥ अतः अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषको स्त्रीको कष्ट देकर अर्थात् उसके भोजनमेंसे बचाकर भी देश और कालका विचार करके भिक्षुकको शक्तिके अनुसार अवश्य अन्नदान करना चाहिये ॥

विप्रमध्वपरिश्रान्तं बालं वृद्धमथापि वा । अर्चयेद् गुरुवत् प्रीतो गृहस्थो गृहमागतम् ॥ ब्राह्मण बालक हो अथवा बूढ़ा, यदि वह रास्तेका थका-माँदा घरपर आ जाय तो गृहस्थ पुरुषको बड़ी प्रसन्नताके साथ गुरुकी भाँति उसका सत्कार करना चाहिये ॥

क्रोधमुत्पतितं हित्वा सुशीलो वीतमत्सरः । अर्चयेदतिथिं प्रीतः परत्र हितभूतये ॥ परलोकमें कल्याणकी प्राप्तिके लिये मनुष्यको अपने प्रकट हुए क्रोधको भी रोककर, मत्सरताका त्याग करके सुशीलता और प्रसन्नतापूर्वक अतिथिकी पूजा करनी चाहिये ॥

अतिथिं नावमन्येत नानृतां गिरमीरयेत् । न पृच्छेद् गोत्रचरणं नाधीतं वा कदाचन ॥ गृहस्थ पुरुष कभी अतिथिका अनादर न करे, उससे झूठी बात न कहे तथा उसके गोत्र, शाखा और अध्ययनके विषयमें भी कभी प्रश्न न करे ॥

चण्डालो वा श्वपाको वा काले यः कश्चिदागतः । अन्नेन पूजनीयः स्यात् परत्र हितमिच्छता ॥ भोजनके समयपर चाण्डाल या श्वपाक (महा चाण्डाल) भी घर आ जाय तो परलोकमें हित चाहनेवाले गृहस्थको अन्नके द्वारा उसका सत्कार करना चाहिये ॥

पिधाय तु गृहद्वारं भुङ्क्ते योऽन्नं प्रहृष्टवान् । स्वर्गद्वारपिधानं वै कृतं तेन युधिष्ठिर ॥ युधिष्ठिर! जो (किसी भिक्षुकके भयसे) अपने घरका दरवाजा बंद करके प्रसन्नतापूर्वक भोजन करता है, उसने मानो अपने लिये स्वर्गका दरवाजा बंद कर दिया है ॥

पितॄन् देवानृषीन् विप्रानतिथींश्च निराश्रयान् । यो नरः प्रीणयत्यन्नैस्तस्य पुण्यफलं महत् ॥