भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2183, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2183

बलं बलवतो नश्येदन्नहीनस्य देहिनः ।
तस्मादन्नं विशेषेण श्रद्धयाश्रद्धयापि वा ॥
बलवान् पुरुष भी यदि अन्नका त्याग कर दे तो उसका बल नष्ट हो जाता है। इसलिये श्रद्धासे हो या अश्रद्धासे, अधिक चेष्टा करके अन्न-दान देना चाहिये ।।

आदत्ते हि रसं सर्वमादित्यः स्वगभस्तिभिः ।
वायुस्तस्मात् समादाय रसं मेघेषु धारयेत् ॥
सूर्य अपनी किरणोंसे पृथ्वीका सारा रस खींचते हैं और हवा उसे लेकर बादलोंमें स्थापित कर देती है ।।

तत् तु मेघगतं भूमौ शक्रो वर्षति तादृशम् ।
तेन दिग्धा भवेद् देवी मही प्रीता च भारत ॥
भरतनन्दन! बादलोंमें पड़े हुए उस रसको इन्द्र पुनः इस पृथ्वीपर बरसाते हैं। उससे आप्लावित होकर पृथ्वी देवी तृप्त होती हैं ।।

तस्यां सस्यानि रोहन्ति यैर्जीवन्त्यखिलाः प्रजाः ।
मांसमेदोऽस्थिमज्जानां सम्भवस्तेभ्य एव हि ॥
तब उसमेंसे अन्नके पौधे उगते हैं, जिनसे सम्पूर्ण प्रजाका जीवन-निर्वाह होता है। मांस, मेद, अस्थि और मज्जाकी उत्पत्ति नाना प्रकारके अन्नसे ही होती है ।।

(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)