भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2207, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2207

विश्वेभ्यो हि च देवेभ्यः सप्रजापतये तथा ।। षडुक्ता जुहुयात् पश्चात् प्रायश्चित्ताहुतिं द्विजः । पहले नित्य-नियमसे निवृत्त होकर एक वेदीपर अग्निकी स्थापना करे और उसमें क्रमशः आघार, आज्यभाग, प्रणव, महाव्याहृति और पञ्चवारुण होम करके सत्य, विष्णु, ब्रह्मर्षिगण, ब्रह्मा, विश्वेदेव तथा प्रजापति—इन छः देवताओंके निमित्त हवन करे। अन्तमें प्रायश्चित्त-होम करे ।। अतः समापयेदग्निं शान्तिं कृत्वाथ पौष्टिकम् ।। प्रणम्य चाग्निं सोमं च भस्म धृत्वा यथाविधि । नदीं गत्वा विशुद्धात्मा सोमाय वरुणाय च । आदित्याय नमस्कृत्या ततः स्नायात् समाहितः ।। फिर शान्ति और पौष्टिक कर्मका अनुष्ठान करके अग्निमें हवनका कार्य समाप्त कर दे। तत्पश्चात् अग्नि तथा सोमदेवताको प्रणाम करे और विधिपूर्वक शरीरमें भस्म लगाकर नदीके तटपर जा विशुद्धचित्त होकर सोम, वरुण तथा आदित्यको प्रणाम करके एकाग्र भावसे जलमें स्नान करे ।। उत्तीर्योदकमाचम्य चासीनः पूर्वतोमुखः । प्राणायामं ततः कृत्वा पवित्रैरभिषेचनम् ।। इसके बाद बाहर निकलकर आचमन करनेके पश्चात् पूर्वाभिमुख होकर बैठे और प्राणायाम करके कुशकी पवित्रीसे अपने शरीरका मार्जन करे ।। आचान्तस्त्वभिवीक्षेत ऊर्ध्वबाहुर्दिवाकरम् । कृताञ्जलिपुटः स्थित्वा कुर्याच्चैव प्रदक्षिणम् ।। फिर आचमन करके दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर सूर्यका दर्शन करे और हाथ जोड़कर खड़ा हो सूर्यकी प्रदक्षिणा करे ।। नारायणं वा रुद्रं वा ब्रह्माणमथवापि वा । वारुणं मन्त्रसूक्तं वा प्राग्भोजनमथापि वा ।। उसके बाद भोजनसे पूर्व ही नारायण, रुद्र, ब्रह्मा या वरुणसम्बन्धी सूक्तका पाठ करे ।। वीरघ्नमृषथं वापि तथा चाप्यघमर्षणम् । गायत्रीं मम देवीं वा सावित्रीं वा जपेत् ततः । शतं वाष्टशतं वापि सहस्रमथवा परम् ।। अथवा वीरघ्न, ऋषभ, अघमर्षण, गायत्री या मुझसे सम्बन्ध रखनेवाले वैष्णव गायत्री-मन्त्रका जप करे। यह जप सौ बार या एक सौ आठ बार अथवा एक हजार बार करना चाहिये ।। ततो मध्याह्नकाले वै पायसं यावकं हि वा ।