महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 221, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंनमस्यन्ति महाराज वाङ्मनःकर्मभिर्विभुम् ॥ ४०२ ॥
महाराज! विद्याधर, दानव, गुह्यक, राक्षस तथा समस्त चराचर प्राणी मन, वाणी और क्रियाओंद्वारा भगवान् शिवको नमस्कार करते थे ॥ ४०२ ॥
पुरस्ताद् धिष्ठितः शर्वो ममासीत् त्रिदशेश्वरः ।
पुरस्ताद् धिष्ठितं दृष्ट्वा ममेशानं च भारत ॥ ४०३ ॥
सप्रजापतिशक्रान्तं जगन्मामभ्युदैक्षत ।
ईक्षितुं च महादेवं न मे शक्तिरभूत् तदा ॥ ४०४ ॥
देवेश्वर शिव मेरे सामने खड़े थे। भारत! मेरे सामने महादेवजीको खड़ा देख प्रजापतियोंसे लेकर इन्द्रतक सारा जगत् मेरी ओर देखने लगा। किंतु उस समय महादेवजीको देखनेकी मुझमें शक्ति नहीं रह गयी थी ॥ ४०३-४०४ ॥
ततो मामब्रवीद् देवः पश्य कृष्ण वदस्व च ।
त्वया ह्याराधितश्चाहं शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ४०५ ॥
तब भगवान् शिवने मुझसे कहा—'श्रीकृष्ण! मुझे देखो, मुझसे वार्तालाप करो। तुमने पहले भी सैकड़ों और हजारों बार मेरी आराधना की है ॥ ४०५ ॥
त्वत्समो नास्ति मे कश्चित् त्रिषु लोकेषु वै प्रियः ।
शिरसा वन्दिते देवे देवी प्रीता ह्युमा तदा ।
ततोऽहमब्रुवं स्थाणुं स्तुतं ब्रह्मादिभिः सुरैः ॥ ४०६ ॥
'तीनों लोकोंमें तुम्हारे समान दूसरा कोई मुझे प्रिय नहीं है।' जब मैंने मस्तक झुकाकर महादेवजीको प्रणाम किया, तब देवी उमाको बड़ी प्रसन्नता हुई। उस समय मैंने ब्रह्मा आदि देवताओंद्वारा प्रशंसित भगवान् शिवसे इस प्रकार कहा ॥ ४०६ ॥
श्रीकृष्ण उवाच
नमोऽस्तु ते शाश्वत सर्वयोने
ब्रह्माधिपं त्वामृषयो वदन्ति ।
तपश्च सत्त्वं च रजस्तमश्च
त्वामेव सत्यं च वदन्ति सन्तः ॥ ४०७ ॥
श्रीकृष्ण कहते हैं— सबके कारणभूत सनातन परमेश्वर! आपको नमस्कार है। ऋषि आपको ब्रह्माजीका भी अधिपति बताते हैं। साधु पुरुष आपको ही तप, सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुण तथा सत्यस्वरूप कहते हैं ॥ ४०७ ॥
त्वं वै ब्रह्मा च रुद्रश्च वरुणोऽग्निर्मनुर्भवः ।
धाता त्वष्टा विधाता च त्वं प्रभुः सर्वतोमुखः ॥ ४०८ ॥
आप ही ब्रह्मा, रुद्र, वरुण, अग्नि, मनु, शिव, धाता, विधाता और त्वष्टा हैं। आप ही सब ओर मुखवाले परमेश्वर हैं ॥ ४०८ ॥