महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 223, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंपर्यायवाचकैः शब्दैर्महानात्मा विभाव्यते । त्वां बुद्ध्वा ब्राह्मणो वेदात् प्रमोहं विनियच्छति ॥ ४१७ ॥ महान्, आत्मा, मति, ब्रह्मा, विश्व, शम्भु, स्वयम्भू, बुद्धि, प्रज्ञा, उपलब्धि, संवित्, ख्याति, धृति और स्मृति—इन चौदह पर्यायवाची शब्दोंद्वारा आप परमात्मा ही प्रकाशित होते हैं। वेदसे आपका बोध प्राप्त करके ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मण मोहका सर्वथा नाश कर देता है ॥
हृदयं सर्वभूतानां क्षेत्रज्ञस्त्वमृषिस्तुतः । सर्वतःपाणिपादस्त्वं सर्वतोऽक्षिशिरोमुखः ॥ ४१८ ॥ ऋषियोंद्वारा प्रशंसित आप ही सम्पूर्ण भूतोंके हृदयमें स्थित क्षेत्रज्ञ हैं। आपके सब ओर हाथ-पैर हैं। सब ओर नेत्र, मस्तक और मुख हैं ॥ ४१८ ॥
सर्वतःश्रुतिमाँल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठसि । फलं त्वमसि तिग्मांशोर्निमेषादिषु कर्मसु ॥ ४१९ ॥ आपके सब ओर कान हैं और जगत्में आप सबको व्याप्त करके स्थित हैं। जीवके आँख मीजने और खोलनेसे लेकर जितने कर्म हैं, उनके फल आप ही हैं ॥ ४१९ ॥
त्वं वै प्रभार्चिः पुरुषः सर्वस्य हृदि संश्रितः । अणिमा महिमा प्राप्तिरीशानो ज्योतिरव्ययः ॥ ४२० ॥ आप अविनाशी परमेश्वर ही सूर्यकी प्रभा और अग्निकी ज्वाला हैं। आप ही सबके हृदयमें आत्मारूपसे निवास करते हैं। अणिमा, महिमा और प्राप्ति आदि सिद्धियाँ तथा ज्योति भी आप ही हैं ॥ ४२० ॥
त्वयि बुद्धिर्मतिर्लोकाः प्रपन्नाः संश्रिताश्च ये । ध्यानिनो नित्ययोगाश्च सत्यसत्त्वा जितेन्द्रियाः ॥ ४२१ ॥ आपमें बोध और मननकी शक्ति विद्यमान है। जो लोग आपकी शरणमें आकर सर्वथा आपके आश्रित रहते हैं, वे ध्यानपरायण, नित्य योगयुक्त, सत्यसंकल्प तथा जितेन्द्रिय होते हैं ॥ ४२१ ॥
यस्त्वां ध्रुवं वेदयते गुहाशयं प्रभुं पुराणं पुरुषं च विग्रहम् । हिरण्मयं बुद्धिमतां परां गतिं स बुद्धिमान् बुद्धिमतीत्य तिष्ठति ॥ ४२२ ॥ जो आपको अपनी हृदयगुहामें स्थित आत्मा, प्रभु, पुराण-पुरुष, मूर्तिमान् परब्रह्म, हिरण्मय पुरुष और बुद्धिमानोंकी परम गतिरूपमें निश्चित भावसे जानता है, वही बुद्धिमान् लौकिक बुद्धिका उल्लंघन करके परमात्म-भावमें प्रतिष्ठित होता है ॥ ४२२ ॥
विदित्वा सप्त सूक्ष्माणि षडङ्गं त्वां च मूर्तितः । प्रधानविधियोगस्थस्त्वामेव विशते बुधः ॥ ४२३ ॥