महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2250, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहात्मा पाण्डव सदा अच्छा बर्ताव करते थे; इसलिये अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्र उनके ऊपर बहुत प्रसन्न रहते थे ॥ १५ १/२ ॥ सौबलेयी च गान्धारी पुत्रशोकमपास्य तम् ॥ १६ ॥ सदैव प्रीतिमत्यासीत् तनयेषु निजेष्विव । सुबलपुत्री गान्धारी भी अपने पुत्रोंका शोक छोड़कर पाण्डवोंपर सदा अपने सगे पुत्रोंके समान प्रेम करती थीं ॥ १६ १/२ ॥ प्रियाण्येव तु कौरव्यो नाप्रियाणि कुरूद्वहः ॥ १७ ॥ वैचित्रवीर्ये नृपतौ समाचरत वीर्यवान् । पराक्रमी कुरुकुलतिलक राजा युधिष्ठिर महाराज धृतराष्ट्रका सदा प्रिय ही करते थे, अप्रिय नहीं करते थे ॥ १७ १/२ ॥ यद् यद् ब्रूते च किंचित् स धृतराष्ट्रो जनाधिपः ॥ १८ ॥ गुरु वा लघु वा कार्यं गान्धारी च तपस्विनी । तं स राजा महाराज पाण्डवानां धुरंधरः ॥ १९ ॥ पूजयित्वा वचस्तत् तदकार्षीत् परवीरहा । महाराज! राजा धृतराष्ट्र और तपस्विनी गान्धारी देवी ये दोनों जो कोई भी छोटा या बड़ा कार्य करनेके लिये कहते, पाण्डवधुरन्धर शत्रुसूदन राजा युधिष्ठिर उनके उस आदेशको सादर शिरोधार्य करके वह सारा कार्य पूर्ण करते थे ॥ १८-१९ १/२ ॥ तेन तस्याभवत् प्रीतो वृत्तेन स नराधिपः ॥ २० ॥ अन्वतप्यत संस्मृत्य पुत्रं तं मन्दचेतसम् । उनके उस बर्तावसे राजा धृतराष्ट्र सदा प्रसन्न रहते और अपने उस मन्दबुद्धि दुर्योधनको याद करके पछताया करते थे ॥ २० १/२ ॥ सदा च प्रातरुत्थाय कृतजप्यः शुचिर्नृपः ॥ २१ ॥ आशास्ते पाण्डुपुत्राणां समरेष्वपराजयम् । प्रतिदिन सबेरे उठकर स्नान-संध्या एवं गायत्रीजप कर लेनेके पश्चात् पवित्र हुए राजा धृतराष्ट्र सदा पाण्डवोंको समरविजयी होनेका आशीर्वाद देते थे ॥ ब्राह्मणान् स्वस्ति वाच्याथ हुत्वा चैव हुताशनम् ॥ २२ ॥ आयूंषि पाण्डुपुत्राणामाशंसत नराधिपः । ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर अग्निमें हवन करनेके पश्चात् राजा धृतराष्ट्र सदा यह शुभकामना करते थे कि पाण्डवोंकी आयु बढ़े ॥ २२ १/२ ॥ न तां प्रीतिं परामाप पुत्रेभ्यः स कुरूद्वहः ॥ २३ ॥ यां प्रीतिं पाण्डुपुत्रेभ्यः सदावाप नराधिपः ।