भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 227, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 227

शमप्राप्तिं प्रवृणे चापि दाक्ष्यम् ॥ ६ ॥ ‘ब्राह्मणोंपर कभी मेरे मनमें क्रोध न हो। मेरे पिता मुझपर प्रसन्न रहें। मुझे सैकड़ों पुत्र प्राप्त हों। उत्तम भोग सदा उपलब्ध रहें। हमारे कुलमें प्रसन्नता बनी रहे। मेरी माता भी प्रसन्न रहें। मुझे शान्ति मिले और प्रत्येक कार्यमें कुशलता प्राप्त हो—ये आठ वर और माँगता हूँ’ ॥ ६ ॥

उमोवाच

एवं भविष्यत्यमरप्रभाव नाहं मृषा जातु वदे कदाचित् । भार्यासहस्राणि च षोडशैव तासु प्रियत्वं च तथाक्षयं च ॥ ७ ॥ प्रीतिं चाग्र्यां बान्धवानां सकाशाद् ददामि तेऽहं वपुषः काम्यतां च । भोक्ष्यन्ते वै सप्ततिं वै शतानि गृहे तुभ्यमतिथीनां च नित्यम् ॥ ८ ॥ **भगवती उमाने कहा—**अमरोंके समान प्रभावशाली श्रीकृष्ण! ऐसा ही होगा। मैं कभी झूठ नहीं बोलती हूँ। तुम्हें सोलह हजार रानियाँ होंगी। उनका तुम्हारे प्रति प्रेम रहेगा। तुम्हें अक्षय धनधान्यकी प्राप्ति होगी। बन्धु-बान्धवोंकी ओरसे तुम्हें प्रसन्नता प्राप्त होगी। मैं तुम्हारे इस शरीरके सदा कमनीय बने रहनेका वर देती हूँ और तुम्हारे घरमें प्रतिदिन सात हजार अतिथि भोजन करेंगे* ॥ ७-८ ॥

वासुदेव उवाच

एवं दत्त्वा वरान् देवो मम देवी च भारत । अन्तर्हितः क्षणे तस्मिन् सगणो भीमपूर्वज ॥ ९ ॥ **भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—**भरतनन्दन! भीमसेनके बड़े भैया! इस प्रकार महादेवजी तथा देवी पार्वती मुझे वरदान देकर अपने गणोंके साथ उसी क्षण अन्तर्धान हो गये ॥ ९ ॥

एतदत्यद्भुतं पूर्वं ब्राह्मणायातितेजसे । उपमन्यवे मया कृत्स्नं व्याख्यातं पार्थिवोत्तम । नमस्कृत्या तु स प्राह देवदेवाय सुव्रत ॥ १० ॥ नृपश्रेष्ठ! यह अत्यन्त अद्भुत वृत्तान्त मैंने पहले महातेजस्वी ब्राह्मण उपमन्युको पूर्णरूपसे बताया था। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले नरेश! उपमन्युने देवाधिदेव महादेवजीको नमस्कार करके इस प्रकार कहा ॥ १० ॥