महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2270, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदशसमा भुक्तं दत्तं च विविधं वसु ॥ १५ ॥ ‘जब तुम वनमें चले गये थे, उन दिनों तेरह वर्षोंतक अपने पुत्रके अधीन रहनेवाले विशाल राज्यका इन्होंने उपभोग किया और नाना प्रकारके धन दिये हैं ॥ त्वया चायं नरव्याघ्र गुरुशुश्रूषयानघ । आराधितः सभृत्येन गान्धारी च यशस्विनी ॥ १६ ॥ ‘निष्पाप नरव्याघ्र! सेवकोंसहित तुमने भी गुरुसेवाके भावसे इनकी तथा यशस्विनी गान्धारी देवीकी आराधना की है ॥ १६ ॥ अनुजानीहि पितरं समयोऽस्य तपोविधौ । न मन्युर्विद्यते चास्य सुसूक्ष्मोऽपि युधिष्ठिर ॥ १७ ॥ ‘अतः तुम अपने पिताको वनमें जानेकी अनुमति दे दो; क्योंकि अब इनके तप करनेका समय आया है। युधिष्ठिर! इनके मनमें तुम्हारे ऊपर अणुमात्र भी रोष नही है’ ॥ १७ ॥
वैशम्पायन उवाच
एतावदुक्त्वा वचनमनुमान्य च पार्थिवम् । तथास्त्विति च तेनोक्तः कौन्तेयेन ययौ वनम् ॥ १८ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! यों कहकर महर्षि व्यासने राजा युधिष्ठिरको राजी कर लिया और ‘बहुत अच्छा’ कहकर जब युधिष्ठिरने उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली, तब वे वनमें अपने आश्रमपर चले गये ॥ १८ ॥ गते भगवति व्यासे राजा पाण्डुसुतस्तदा । प्रोवाच पितरं वृद्धं मन्दं मन्दमिवानतः ॥ १९ ॥ भगवान् व्यासके चले जानेपर राजा युधिष्ठिरने अपने बूढ़े ताऊ धृतराष्ट्रसे नम्रतापूर्वक धीरे-धीरे कहा— ॥ यदाह भगवान् व्यासो यच्चापि भवतो मतम् । यथाऽऽह च महेष्वासः कृपो विदुर एव च ॥ २० ॥ युयुत्सुः संजयश्चैव तत्कर्तास्म्यहमञ्जसा । सर्व एव हि मान्या मे कुलस्य हि हितैषिणः ॥ २१ ॥ ‘पिताजी! भगवान् व्यासने जो आज्ञा दी है और आपने जो कुछ करनेका निश्चय किया है तथा महान् धनुर्धर कृपाचार्य, विदुर, युयुत्सु और संजय जैसा कहेंगे, निस्संदेह मैं वैसा ही करूँगा; क्योंकि ये सब लोग इस कुलके हितैषी होनेके कारण मेरे लिये माननीय हैं ॥ २०-२१ ॥ इदं तु याचे नृपते त्वामहं शिरसा नतः । क्रियतां तावदाहारस्ततो गच्छाश्रमं प्रति ॥ २२ ॥