महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2280, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहाबाहो! पहले राजप्रधान बारह और मन्त्रिप्रधान साठ—इन बहत्तरका ज्ञान प्राप्त करके संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रय—इन छः गुणोंका यथावसर उपयोग किया जाता है। कुन्तीनन्दन! जब अपना पक्ष बलवान् तथा शत्रु का पक्ष निर्बल जान पड़े, उस समय शत्रुके साथ युद्ध छेड़कर विपक्षी राजाको जीतनेका प्रयत्न करना चाहिये ।। ६-७ ।।
यदा परे च बलिनः स्वपक्षश्चैव दुर्बलः ।
सार्धं विद्वांस्तदा क्षीणः परैः संधिं समाश्रयेत् ।। ८ ।।
परंतु जब शत्रु-पक्ष प्रबल और अपना ही पक्ष दुर्बल हो, उस समय क्षीणशक्ति विद्वान् पुरुष शत्रुओंके साथ संधि कर ले ।। ८ ।।
द्रव्याणां संचयश्चैव कर्तव्यः सुमहांस्तथा ।
तदा समर्थो यानाय नचिरेणैव भारत ।। ९ ।।
तदा सर्वं विधेयं स्यात् स्थाने न स विचारयेत् ।
भारत! राजाको सदैव द्रव्योंका महान् संग्रह करते रहना चाहिये। जब वह शीघ्र ही शत्रुपर आक्रमण करनेमें समर्थ हो, उस समय उसका जो कर्तव्य हो, उसे वह स्थिरतापूर्वक भलीभाँति विचार ले ।। ९ १/२ ।।
भूमिरल्पफला देया विपरीतस्य भारत ।। १० ।।
हिरण्यं कुप्यभूयिष्ठं मित्रं क्षीणमथो बलम् ।
भारत! यदि अपनी विपरीत अवस्था हो तो शत्रुको कम उपजाऊ भूमि, थोड़ा-सा सोना और अधिक मात्रामें जस्ता-पीतल आदि धातु तथा दुर्बल मित्र एवं सेना देकर उसके साथ संधि करे ।। १० १/२ ।।
विपरीतान्निगृह्णीयात् स्वं हि संधिविशारदः ।। ११ ।।
संध्यर्थं राजपुत्रं वा लिप्सैथा भरतर्षभ ।
विपरीतं न तच्छ्रेयः पुत्र कस्यांचिदापदि ।। १२ ।।
तस्याः प्रमोक्षे यत्नं च कुर्याः सोपायमन्त्रवित् ।
यदि शत्रु की विपरीत दशा हो और वह संधिके लिये प्रार्थना करे तो संधिविशारद पुरुष उससे उपजाऊ भूमि, सोना-चाँदी आदि धातु तथा बलवान् मित्र एवं सेना लेकर उसके साथ संधि करे अथवा भरतश्रेष्ठ! प्रतिद्वन्द्वी राजाके राजकुमारको ही अपने यहाँ जमानतके तौरपर रखनेकी चेष्टा करनी चाहिये। इसके विपरीत बर्ताव करना अच्छा नहीं है। बेटा! यदि कोई आपत्ति आ जाय तो उचित उपाय और मन्त्रणाके ज्ञाता तुम-जैसे राजाको उससे छूटनेका प्रयत्न करना चाहिये ।।
प्रकृतीनां च राजेन्द्र राजा दीनान् विभावयेत् ।। १३ ।।
क्रमेण युगपत् सर्वं व्यवसायं महाबलः ।
पीडनं स्तम्भनं चैव कोशभङ्गस्तथैव च ।। १४ ।।