महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतद् वो हृदि न कर्तव्यं मया बद्धोऽयमञ्जलिः । उस अवसरपर मुझसे भला या बुरा जो कुछ भी कृत्य हो गया, उसे आपलोग अपने मनमें न लावें। इसके लिये मैं आपलोगोंसे हाथ जोड़कर क्षमा-प्रार्थना करता हूँ ।। ६½ ।। वृद्धोऽयं हतपुत्रोऽयं दुःखितोऽयं नराधिपः ।। ७ ।। पूर्वराज्ञां च पुत्रोऽयमिति कृत्वानुजानथ । 'यह राजा धृतराष्ट्र बूढ़ा है। इसके पुत्र मारे गये हैं; अतः यह दुःखमें डूबा हुआ है और यह अपने प्राचीन राजाओंका वंशज है'—ऐसा समझकर आपलोग मेरे अपराधोंको क्षमा करते हुए मुझे वनमें जानेकी आज्ञा दें ।। ७½ ।। इयं च कृपणा वृद्धा हतपुत्रा तपस्विनी ।। ८ ।। गान्धारी पुत्रशोकार्ता युष्मान् याचति वै मया । यह बेचारी वृद्धा तपस्विनी गान्धारी, जिसके सभी पुत्र मारे गये हैं तथा जो पुत्रशोकसे व्याकुल रहती है, मेरे साथ आपलोगोंसे क्षमा-याचना करती है ।। ८½ ।। हतपुत्राविमौ वृद्धौ विदित्वा दुःखितौ तथा ।। ९ ।। अनुजानीत भद्रं वो व्रजाव शरणं च वः । इन दोनों बूढ़ोंको पुत्रोंके मारे जानेसे दुःखी जानकर आपलोग वनमें जानेकी आज्ञा दें। आपका कल्याण हो। हम दोनों आपकी शरणमें आये हैं ।। ९½ ।। अयं च कौरवो राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।। १० ।। सर्वैर्भवद्भिर्द्रष्टव्यः समेषु विषमेषु च । ये कुरुकुलरत्न कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर आपलोगोंके पालक हैं। अच्छे और बुरे सभी समयोंमें आप सब लोग इनपर कृपादृष्टि रखें ।। १०½ ।। न जातु विषमं चैव गमिष्यति कदाचन ।। ११ ।। चत्वारः सचिवा यस्य भ्रातरो विपुलौजसः । लोकपालसमा ह्येते सर्वधर्मार्थदर्शिनः ।। १२ ।। ब्रह्मेव भगवानेष सर्वभूतजगत्पतिः । (एवमेव महाबाहुर्भीमार्जुनयमैर्वृतः ।) युधिष्ठिरो महातेजा भवतः पालयिष्यति ।। १३ ।। ये कभी आपलोगोंके प्रति विषमभाव नहीं रखेंगे। लोकपालोंके समान महातेजस्वी तथा सम्पूर्ण धर्म और अर्थके मर्मज्ञ ये चार भाई जिनके सचिव हैं, वे भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेवसे घिरे हुए महाबाहु महातेजस्वी युधिष्ठिर सम्पूर्ण जीव-जगत्के स्वामी भगवान् ब्रह्माकी भाँति आपलोगोंका इसी तरह पालन करेंगे, जैसे पहलेके लोग करते आये हैं ।। ११—१३ ।। अवश्यमेव वक्तव्यमिति कृत्वा ब्रवीमि वः ।