महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवेद धर्मं च कृत्स्नेन सम्यक् त्वं भव सुव्रतः ।
'आप भी पुण्य एवं धर्ममें ऊँची स्थिति प्राप्त करें। आप सम्पूर्ण धर्मोंको ठीक-ठीक जानते हैं, इसलिये उत्तम व्रतोंके अनुष्ठानमें लग जाइये ।। ३८ १/२ ।।
दृष्टिप्रदानमपि ते पाण्डवान् प्रति नो वृथा ।। ३९ ।।
समर्थास्त्रिदिवस्यापि पालने किं पुनः क्षितेः ।
'आप जो हमारी देख-रेख करनेके लिये हमें पाण्डवोंको सौंप रहे हैं, वह सब व्यर्थ है। ये पाण्डव तो स्वर्गका भी पालन करनेमें समर्थ हैं; फिर इस भूमण्डलकी तो बात ही क्या है ।। ३९ १/२ ।।
अनुवर्त्स्यन्ति वा धीमन् समेषु विषमेषु च ।। ४० ।।
प्रजाः कुरुकुलश्रेष्ठ पाण्डवान् शीलभूषणान् ।
'बुद्धिमान् कुरुकुलश्रेष्ठ! समस्त पाण्डव शीलरूपी सद्गुणसे विभूषित हैं; अतः भले-बुरे सभी समयोंमें सारी प्रजा निश्चय ही उनका अनुसरण करेगी ।। ४० १/२ ।।
ब्रह्मदेयाग्रहारांश्च पारिबर्हाश्च पार्थिवः ।। ४१ ।।
पूर्वराजाभिपन्नांश्च पालयत्येव पाण्डवः ।
'ये पृथ्वीनाथ पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर अपने दिये हुए तथा पहलेके राजाओंद्वारा अर्पित किये गये ब्राह्मणोंके लिये दातव्य अग्रहारों (दानमें दिये गये ग्रामों) तथा पारिबर्हों (पुरस्कारमें दिये गये ग्रामों)-की भी रक्षा करते ही हैं ।। ४१ १/२ ।।
दीर्घदर्शी मृदुर्दान्तः सदा वैश्रवणो यथा ।। ४२ ।।
अक्षुद्रसचिवश्चायं कुन्तीपुत्रो महामनाः ।
'ये कुन्तीकुमार सदा कुबेरके समान दीर्घदर्शी, कोमल स्वभाववाले और जितेन्द्रिय हैं। इनके मन्त्री भी उच्च विचारके हैं। इनका हृदय बड़ा ही विशाल है ।।
अप्यमित्रे दयावांश्च शुचिश्च भरतर्षभः ।। ४३ ।।
ऋजुं पश्यति मेधावी पुत्रवत् पाति नः सदा ।
'ये भरतकुलभूषण युधिष्ठिर शत्रुओंपर भी दया करनेवाले और परम पवित्र हैं। बुद्धिमान् होनेके साथ ही ये सबको सरलभावसे देखनेवाले हैं और हमलोगोंका सदा पुत्रवत् पालन करते हैं ।। ४३ १/२ ।।
विप्रियं च जनस्यास्य संसर्गाद् धर्मजस्य वै ।। ४४ ।।
न करिष्यन्ति राजर्षे तथा भीमर्जुनादयः ।
'राजर्षे! इन धर्मपुत्र युधिष्ठिरके संसर्गसे भीमसेन और अर्जुन आदि भी इस जनसमुदाय (प्रजावर्ग)-का कभी अप्रिय नहीं करेंगे ।। ४४ १/२ ।।
मन्दा मृदुषु कौरव्य तीक्ष्णेष्वाशीविषोपमाः ।। ४५ ।।
वीर्यवन्तो महात्मानः पौराणां च हिते रताः ।