महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2317, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंविमुच्योच्चैर्महानादं हि साधो क्व यास्यसीत्यपतत् तात भूमौ ॥ ६ ॥ तात! उस समय राजा युधिष्ठिर हाथ जोड़े हुए काँपने लगे। आँसुओंसे उनका गला भर आया। वे जोर-जोरसे महान् आर्तनाद करते हुए फूट-फूटकर रोने लगे। और 'महात्मन्! आप मुझे छोड़कर कहाँ चले जा रहे हैं।' ऐसा कहते हुए पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ६ ॥
तथार्जुनस्तीव्रदुःखाभितप्तो मुहुर्मुहुर्निःश्वसन् भारताग्र्यः । युधिष्ठिरं मैवमित्येवमुक्त्वा निगृह्याथो दीनवत् सीदमानः ॥ ७ ॥ उस समय भरतवंशके अग्रगण्य वीर अर्जुन दुःसह दुःखसे संतप्त हो बारंबार लंबी साँस खींचते हुए वहाँ युधिष्ठिरसे बोले—'भैया! आप ऐसे अधीर न हो जाइये।' यों कहकर वे उन्हें दोनों हाथोंसे पकड़कर दीनकी भाँति शिथिल होकर बैठ गये ॥ ७ ॥
वृकोदरः फाल्गुनश्चैव वीरौ माद्रीपुत्रौ विदुरः संजयश्च । वैश्यापुत्रः सहितो गौतमेन धौम्यो विप्राश्चान्वयुर्बाष्पकण्ठाः ॥ ८ ॥ कुन्ती गान्धारीं बद्धनेत्रां व्रजन्तीं स्कन्धासक्तं हस्तमथोद्वहन्ती । राजा गान्धार्याः स्कन्धदेशेऽवसज्य पाणिं ययौ धृतराष्ट्रः प्रतीतः ॥ ९ ॥ तत्पश्चात् युधिष्ठिरसहित भीमसेन, अर्जुन, वीर माद्रीकुमार, विदुर, संजय, वैश्यापुत्र युयुत्सु, कृपाचार्य, धौम्य तथा और भी बहुत-से ब्राह्मण आँसू बहाते हुए गद्गदकण्ठ होकर उनके पीछे-पीछे चले। आगे-आगे कुन्ती अपने कंधेपर रखे हुए गान्धारीके हाथको पकड़े चल रही थीं। उनके पीछे आँखोंपर पट्टी बाँधे गान्धारी थी और राजा धृतराष्ट्र गान्धारीके कंधेपर हाथ रखे निश्चिन्ततापूर्वक चले जा रहे थे ॥ ८-९ ॥