भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2329, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2329

यह राज्यमें रहकर भी तपस्या कर सकती है और महान् दान-व्रतका अनुष्ठान करनेमें समर्थ हो सकती है; अतः यह आज मेरी बात ध्यान देकर सुने ।। ७ ।। गांधारि परितुष्टोऽस्मि वध्वाः शुश्रूषणेन वै । तस्मात् त्वमेनां धर्मज्ञे समनुज्ञातुमर्हसि ।। ८ ।। ‘धर्मको जाननेवाली गान्धारी! मैं बहू कुन्तीकी सेवा-शुश्रूषासे बहुत संतुष्ट हूँ; अतः आज तुम इसे घर लौटनेकी आज्ञा दे दो’ ।। ८ ।। इत्युक्ता सौबलेयी तु राज्ञा कुन्तीमुवाच ह । तत् सर्वं राजवचनं स्वं च वाक्यं विशेषवत् ।। ९ ।। राजा धृतराष्ट्रके ऐसा कहनेपर सुबलकुमारी गान्धारीने कुन्तीसे राजाकी आज्ञा कह सुनायी और अपनी ओरसे भी उन्हें लौटनेके लिये विशेष जोर दिया ।। ९ ।। न च सा वनवासाय देवी कृतमतिं तदा । शक्नोत्युपावर्तयितुं कुन्तीं धर्मपरां सतीम् ।। १० ।। परंतु धर्मपरायणा सती-साध्वी कुन्तीदेवी वनमें रहनेका दृढ़ निश्चय कर चुकी थीं; अतः गान्धारीदेवी उन्हें घरकी ओर लौटा न सकीं ।। १० ।। तस्यास्तां तु स्थितिं ज्ञात्वा व्यवसायं कुरुस्त्रियः । निवृत्तांश्च कुरुश्रेष्ठान् दृष्ट्वा प्ररुरुदुस्तदा ।। ११ ।। कुन्तीकी यह स्थिति और वनमें रहनेका दृढ़ निश्चय जान कुरुश्रेष्ठ पाण्डवोंको निराश लौटते देख कुरुकुलकी सारी स्त्रियाँ फूट-फूटकर रोने लगीं ।। ११ ।। उपावृत्तेषु पार्थेषु सर्वास्वेव वधूषु च । ययौ राजा महाप्राज्ञो धृतराष्ट्रो वनं तदा ।। १२ ।। कुन्तीके सभी पुत्र और सारी बहुएँ जब लौट गयीं, तब महाज्ञानी राजा धृतराष्ट्र वनकी ओर चले ।। पाण्डवाश्चातिदीनास्ते दुःखशोकपरायणाः । यानैः स्त्रीसहिताः सर्वे पुरं प्रविविशुस्तदा ।। १३ ।। उस समय पाण्डव अत्यन्त दीन और दुःख-शोकमें मग्न हो रहे थे। उन्होने वाहनोंपर बैठकर स्त्रियोंसहित नगरमें प्रवेश किया ।। १३ ।। तदहृष्टमनानन्दं गतोत्सवमिवाभवत् । नगरं हास्तिनपुरं सस्त्रीवृद्धकुमारकम् ।। १४ ।। उस दिन बालक, वृद्ध और स्त्रियोंसहित सारा हस्तिनापुर नगर हर्ष और आनन्दसे रहित तथा उत्सवशून्य-सा हो रहा था ।। १४ ।। सर्वे चासन् निरुत्साहाः पाण्डवा जातमन्यवः । कुन्त्या हीनाः सुदुःखार्ता वत्सा इव विनाकृताः ।। १५ ।।