भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2342, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2342

बच्चेसे लेकर बूढ़ेतक समस्त पुरवासी चिन्ता और शोकसे पीड़ित हो जहाँ-तहाँ एक-दूसरेसे मिलकर उपर्युक्त बातें ही किया करते थे॥ ७॥ पाण्डवाश्चैव ते सर्वे भृशं शोकपरायणाः। शोचन्तो मातरं वृद्धामूषुर्नातिचिरं पुरे॥ ८॥ समस्त पाण्डव तो निरन्तर अत्यन्त शोकमें ही डूबे रहते थे। वे अपनी बूढ़ी माताके लिये इतने चिन्तित हो गये कि अधिक कालतक नगरमें नहीं रह सके॥ ८॥ तथैव वृद्धं पितरं हतपुत्रं जनेश्वरम्। गान्धारीं च महाभागां विदुरं च महामतिम्॥ ९॥ नैषां बभूव सम्प्रीतिस्तान् विचिन्तयतां तदा। न राज्ये न च नारीषु न वेदाध्ययनेषु च॥ १०॥ जिनके पुत्र मारे गये थे, उन बूढ़े ताऊ महाराज धृतराष्ट्रकी, महाभागा गान्धारीकी और परम बुद्धिमान् विदुरकी अधिक चिन्ता करनेके कारण उन्हें कभी चैन नहीं पड़ती थी। न तो राजकाजमें उनका मन लगता था न स्त्रियोंमें। वेदाध्ययनमें भी उनकी रुचि नहीं होती थी॥ ९-१०॥ परं निर्वेदमगमंश्चिन्तयन्तो नराधिपम्। तं च ज्ञातिवधं घोरं संस्मरन्तः पुनः पुनः॥ ११॥ राजा धृतराष्ट्रको याद करके वे अत्यन्त खिन्न एवं विरक्त हो उठते थे। भाई-बन्धुओंके उस भयंकर वधका उन्हें बारंबार स्मरण हो आता था॥ ११॥ अभिमन्योश्च बालस्य विनाशं रणमूर्धनि। कर्णस्य च महाबाहो संग्रामेष्वपलायिनः॥ १२॥ महाबाहु जनमेजय! युद्धके मुहानेपर जो बालक अभिमन्युका अन्यायपूर्वक विनाश किया गया, संग्राममें कभी पीठ न दिखानेवाले कर्णका (परिचय न होनेसे) जो वध किया गया—इन घटनाओंको याद करके वे बेचैन हो जाते थे॥ १२॥ तथैव द्रौपदेयानामन्येषां सुहृदामपि। वधं संस्मृत्य ते वीरा नातिप्रमनसोऽभवन्॥ १३॥ इसी प्रकार द्रौपदीके पुत्रों तथा अन्यान्य सुहृदोंके वधकी बात याद करके उनके मनकी सारी प्रसन्नता भाग जाती थी॥ १३॥ हतप्रवीरां पृथिवीं हतरत्नां च भारत। सदैव चिन्तयन्तस्ते न शर्म चोपलेभिरे॥ १४॥ भरतनन्दन! जिसके प्रमुख वीर मारे गये तथा रत्नोंका अपहरण हो गया, उस पृथ्वीकी दुर्दशाका सदैव चिन्तन करते हुए पाण्डव कभी थोड़ी देरके लिये भी शान्ति नहीं पाते थे॥ १४॥ द्रौपदी हतपुत्रा च सुभद्रा चैव भाविनी।