महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2363, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंदूरादालक्षितः क्षत्ता तत्राख्यातो महीपतेः । निवर्तमानः सहसा राजन् दृष्ट्वाऽऽश्रमं प्रति ।। १९ ।। राजा धृतराष्ट्र इस प्रकार कह ही रहे थे कि मुखमें पत्थरका टुकड़ा लिये जटाधारी कृशकाय विदुरजी दूरसे आते दिखायी दिये। वे दिगम्बर (वस्त्रहीन) थे। उनके सारे शरीरमें मैल जमी हुई थी। वे वनमें उड़ती हुई धूलोंसे नहा गये थे। राजा युधिष्ठिरको उनके आनेकी सूचना दी गयी। राजन्! विदुरजी उस आश्रमकी ओर देखकर सहसा पीछेकी ओर लौट पड़े ।। १८-१९ ।। तमन्वधावन्नृपतिरेक एव युधिष्ठिरः । प्रविशन्तं वनं घोरं लक्ष्यालक्ष्यं क्वचित् क्वचित् ।। २० ।। भो भो विदुर राजाहं दयितस्ते युधिष्ठिरः । इति ब्रुवन्नरपतिस्तं यत्नादभ्यधावत ।। २१ ।। यह देख राजा युधिष्ठिर अकेले ही उनके पीछे-पीछे दौड़े। विदुरजी कभी दिखायी देते और कभी अदृश्य हो जाते थे। जब वे एक घोर वनमें प्रवेश करने लगे, तब राजा युधिष्ठिर यत्नपूर्वक उनकी ओर दौड़े और इस प्रकार कहने लगे—‘ओ विदुरजी! मैं आपका परमप्रिय राजा युधिष्ठिर आपके दर्शनके लिये आया हूँ’ ।। ततो विविक्त एकान्ते तस्थौ बुद्धिमतां वरः । विदुरो वृक्षमाश्रित्य क्वचित्तत्र वनान्तरे ।। २२ ।। तब बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ विदुरजी वनके भीतर एक परम पवित्र एकान्त प्रदेशमें किसी वृक्षका सहारा लेकर खड़े हो गये ।। २२ ।।