महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2377, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंऋषीणां च पुराणानां देवासुरविमिश्रिताः ॥ १४ ॥ नरेश्वर! उस समय उन लोगोंमें धर्मसे सम्बन्ध रखनेवाली दिव्य कथाएँ होने लगीं। प्राचीन ऋषियों तथा देवताओं और असुरोंसे सम्बन्ध रखनेवाली चर्चाएँ छिड़ गयीं ॥ १४ ॥
ततः कथान्ते व्यासस्तं प्रज्ञाचक्षुषमीश्वरम् । प्रोवाच वदतां श्रेष्ठः पुनरेव स तद् वचः ॥ १५ ॥ प्रीयमाणो महातेजाः सर्ववेदविदां वरः । बातचीतके अन्तमें सम्पूर्ण वेदवेत्ताओं और वक्ताओंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी महर्षि व्यासजीने प्रसन्न होकर प्रज्ञाचक्षु राजा धृतराष्ट्रसे पुनः वही बात कही ॥ १५ ½ ॥
विदितं मम राजेन्द्र यत् ते हृदि विवक्षितम् ॥ १६ ॥ दह्यमानस्य शोकेन तव पुत्रकृतेन वै । ‘राजेन्द्र! तुम्हारे हृदयमें जो कहनेकी इच्छा हो रही है, उसे मैं जानता हूँ। तुम निरन्तर अपने मरे हुए पुत्रोंके शोकसे जलते रहते हो ॥ १६ ½ ॥
गान्धार्याश्चैव यद् दुःखं हृदि तिष्ठति नित्यदा ॥ १७ ॥ कुन्त्याश्च यन्महाराज द्रौपद्याश्च हृदि स्थितम् । ‘महाराज! गान्धारी, कुन्ती और द्रौपदीके हृदयमें भी जो दुःख सदा बना रहता है, वह भी मुझे ज्ञात है ॥
यच्च धारयते तीव्रं दुःखं पुत्रविनाशजम् ॥ १८ ॥ सुभद्रा कृष्णभगिनी तच्चापि विदितं मम । ‘श्रीकृष्णकी बहन सुभद्रा अपने पुत्र अभिमन्युके मारे जानेका जो दुःसह दुःख हृदयमें धारण करती है, वह भी मुझसे अज्ञात नहीं है ॥ १८ ½ ॥
श्रुत्वा समागममिमं सर्वेषां वस्तुतो नृप ॥ १९ ॥ संशयच्छेदनायाहं प्राप्तः कौरवनन्दन । ‘कौरवनन्दन! नरेश्वर! वास्तवमें तुम सब लोगोंका यह समागम सुनकर तुम्हारे मानसिक संदेहोंका निवारण करनेके लिये मैं यहाँ आया हूँ ॥ १९ ½ ॥
इमे च देवगन्धर्वाः सर्वे चेमे महर्षयः ॥ २० ॥ पश्यन्तु तपसो वीर्यमद्य मे चिरसम्भृतम् । ‘ये देवता, गन्धर्व और महर्षि सब लोग आज मेरी चिरसंचित तपस्याका प्रभाव देखें ॥ २० ½ ॥
तदुच्यतां महाप्राज्ञ कं कामं प्रददामि ते ॥ २१ ॥ प्रवणोऽस्मि वरं दातुं पश्य मे तपसः फलम् ।