महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2384, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंइत्युक्त्वान्तर्हितो विप्रस्ततोऽहं विस्मिताभवम् । न च सर्वास्ववस्थासु स्मृतिर्मे विप्रणश्यति ॥ ७ ॥ यों कहकर वे ब्रह्मर्षि अन्तर्धान हो गये। उस समय मैं वहाँ आश्चर्यसे चकित हो गयी। किसी भी अवस्थामें उनकी बात मुझे भूलती नहीं थी ॥ ७ ॥ अथ हर्म्यतलस्थाऽहं रविमुद्यन्तमीक्षती । संस्मृत्य तदृषेर्वाक्यं स्पृहयन्ती दिवानिशम् ॥ ८ ॥ एक दिन जब मैं अपने महलकी छतपर खड़ी थी, उगते हुए सूर्यपर मेरी दृष्टि पड़ी। महर्षि दुर्वासाके वचनोंका स्मरण करके मैं दिन-रात सूर्यदेवको चाहने लगी ॥ ८ ॥ स्थिताऽहं बालभावेन तत्र दोषमबुद्ध्यती । अथ देवः सहस्त्रांशुर्मत्समीपगतोभवत् ॥ ९ ॥ उस समय मैं बाल-स्वभावसे युक्त थी। सूर्यदेवके आगमनसे किस दोषकी प्राप्ति होगी, इसे मैं नहीं समझ सकी। इधर मेरे आवाहन करते ही भगवान् सूर्य पास आकर खड़े हो गये ॥ ९ ॥ द्विधाकृत्वाऽऽत्मनो देहं भूमौ च गगनेऽपि च । तताप लोकानेकेन द्वितीयेनागमत् स माम् ॥ १० ॥ वे अपने दो शरीर बनाकर एकसे आकाशमें रहकर सम्पूर्ण विश्वको प्रकाशित करने लगे और दूसरेसे पृथ्वीपर मेरे पास आ गये ॥ १० ॥ स मामुवाच वेपन्तीं वरं मत्तो वृणीष्व ह । गम्यतामिति तं चाहं प्रणम्य शिरसावदम् ॥ ११ ॥ मैं उन्हें देखते ही काँपने लगी। वे बोले—'देवि! मुझसे कोई वर माँगो।' तब मैंने सिर झुकाकर उनके चरणोंमें प्रणाम किया और कहा—'कृपया यहाँसे चले जाइये' ॥ ११ ॥ स मामुवाच तिग्मांशुर्वृथाऽऽह्वानं न मे क्षमम् । धक्ष्यामि त्वां च विप्रं च येन दत्तो वरस्तव ॥ १२ ॥ तब उन प्रचण्डरश्मि सूर्यने मुझसे कहा—'मेरा आवाहन व्यर्थ नहीं हो सकता। तुम कोई-न-कोई वर अवश्य माँग लो अन्यथा मैं तुमको और जिसने तुम्हें वर दिया है, उस ब्राह्मणको भी भस्म कर डालूँगा' ॥ १२ ॥ तमहं रक्षती विप्रं शापादनपकारिणम् । पुत्रो मे त्वत्समो देव भवेदिति ततोऽब्रवम् ॥ १३ ॥ ततो मां तेजसाऽऽविश्य मोहयित्वा च भानुमान् । उवाच भविता पुत्रस्तवेत्यभ्यगमद् दिवम् ॥ १४ ॥ तब मैं उन निरपराध ब्राह्मणको शापसे बचाती हुई बोली—'देव! मुझे आपके समान पुत्र प्राप्त हो।' इतना कहते ही सूर्यदेव मुझे मोहित करके अपने तेजके द्वारा मेरे शरीरमें