महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2388, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंगन्धर्व, अप्सरा, पिशाच, गुह्यक, राक्षस, पुण्यजन, सिद्ध देवर्षि, देवता, दानव तथा निर्मल देवर्षिगण—ये सभी यहाँ अवतार लेकर कुरुक्षेत्रके समरांगणमें वधको प्राप्त हुए हैं।। ६-७ ।।
गन्धर्वराजो यो धीमान् धृतराष्ट्र इति श्रुतः।
स एव मानुषे लोके धृतराष्ट्रः पतिस्तव ॥ ८ ॥
गन्धर्वोंके लोकमें जो बुद्धिमान् गन्धर्वराज धृतराष्ट्रके नामसे विख्यात हैं, वे ही मनुष्यलोकमें तुम्हारे पति धृतराष्ट्रके रूपमें अवतीर्ण हुए हैं।। ८ ।।
पाण्डुं मरुद्गणाद् विद्धि विशिष्टममच्युतम्।
धर्मस्यांशोऽभवत् क्षत्ता राजा चैव युधिष्ठिरः ॥ ९ ॥
अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले राजा पाण्डुको तुम मरुद्गणोंसे भी श्रेष्ठतम समझो। विदुर धर्मके अंश थे। राजा युधिष्ठिर भी धर्मके ही अंश हैं।।
कलिं दुर्योधनं विद्धि शकुनिं द्वापरं तथा।
दुःशासनादीन् विद्धि त्वं राक्षसान् शुभदर्शने ॥ १० ॥
दुर्योधनको कलियुग समझो और शकुनिको द्वापर। शुभदर्शने! अपने दुःशासन आदि पुत्रोंको राक्षस जानो।।
मरुद्गणाद् भीमसेनं बलवन्तमरिंदमम्।
विद्धि त्वं तु नरम्ऋषिमिमं पार्थं धनंजयम् ॥ ११ ॥
शत्रुओंका दमन करनेवाले बलवान् भीमसेनको मरुद्गणोंके अंशसे उत्पन्न मानो। इन कुन्तीपुत्र धनंजयको तुम पुरातन ऋषि 'नर' समझो।। ११ ।।
नारायणं हृषीकेशमश्विनौ यमौ तथा।
यः स वैरार्थमुद्भूतः संघर्षजननस्तथा।
तं कर्णं विद्धि कल्याणि भास्करं शुभदर्शने ॥ १२ ॥
यश्च पाण्डवदायादो हतः षड्भिर्महारथैः।
स सोम इह सौभद्रो योगादेवाभवद् द्विधा ॥ १३ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण नारायण ऋषिके अवतार हैं। नकुल और सहदेव दोनोंको अश्विनीकुमार समझो। कल्याणि! जो केवल वैर बढ़ानेके लिये उत्पन्न हुआ था और कौरव-पाण्डवोंमें संघर्ष पैदा करानेवाला था, उस कर्णको सूर्य समझो। जिस पाण्डवपुत्रको छः महारथियोंने मिलकर मारा था, उस सुभद्राकुमार अभिमन्युके रूपमें साक्षात् चन्द्रमा ही इस भूतलपर अवतीर्ण हुए थे। वे अपने योगबलसे दो रूपोंमें प्रकट हो गये थे (एक रूपसे चन्द्रलोकमें रहते थे और दूसरेसे भूतलपर) ।। १२-१३ ।।
द्विधा कृत्वाऽऽत्मनो देहमादित्यं तपतां वरम्।
लोकांश्च तापयानं वै विद्धि कर्णं च शोभने ॥ १४ ॥