महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2399, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रविश्य क्षत्रिया मुक्ता जग्मुर्भर्तृसलोकताम् ॥ २२ ॥ इस प्रकार क्रमशः वे सभी शीलवती पतिव्रता क्षत्राणियाँ इस शरीरसे मुक्त हो पतिलोकको चली गयीं ॥ २२ ॥ दिव्यरूपसमायुक्ता दिव्याभरणभूषिताः । दिव्यमाल्याम्बरधरा यथाऽऽसां पतयस्तथा ॥ २३ ॥ जैसे उनके पति थे, उसी प्रकार वे भी दिव्यरूपसे सम्पन्न हो गयीं। दिव्य आभूषण उनके अंगोंकी शोभा बढ़ाने लगे तथा उन्होंने दिव्य माला और दिव्य वस्त्र धारण कर लिये ॥ २३ ॥ ताः शीलगुणसम्पन्ना विमानस्था गतक्लमाः । सर्वाः सर्वगुणोपेताः स्वस्थानं प्रतिपेदिरे ॥ २४ ॥ शील और सद्गुणसे सम्पन्न हुई वे सभी क्षत्रिय-बालाएँ समस्त सद्गुणोंसे अलंकृत हो विमानपर बैठकर अपने-अपने योग्य स्थानको चली गयीं। उनका सारा कष्ट दूर हो गया ॥ २४ ॥ यस्य यस्य तु यः कामस्तस्मिन् काले बभूव ह । तं तं विसृष्टवान् व्यासो वरदो धर्मवत्सलः ॥ २५ ॥ उस समय जिसके-जिसके मनमें जो-जो कामना उत्पन्न हुई, धर्मवत्सल वरदायक भगवान् व्यासने वह सब पूर्ण की ॥ २५ ॥ तच्छ्रुत्वा नरदेवानां पुनरागमनं नराः । जहृषुर्मुदिताश्चासन् नानादेशगता अपि ॥ २६ ॥ संग्राममें मरे हुए राजाओंके पुनरागमनका वृत्तान्त सुनकर भिन्न-भिन्न देशके मनुष्योंको बड़ा आश्चर्य और आनन्द हुआ ॥ २६ ॥ प्रियैः समागमं तेषां यः सम्यक् शृणुयान्नरः । प्रियाणि लभते नित्यमिह च प्रेत्य चैव सः ॥ २७ ॥ जो मनुष्य कौरव-पाण्डवोंके प्रियजन समागमका यह वृत्तान्त भलीभाँति सुनेगा, उसे इहलोक और परलोकमें भी प्रिय वस्तुकी प्राप्ति होगी ॥ २७ ॥ इष्टबान्धवसंयोगमनायासमनामयम् । यश्चैतच्छ्रावयेद् विद्वान् विदुषो धर्मवित्तमः ॥ २८ ॥ स यशः प्राप्नुयाल्लोके परत्र च शुभां गतिम् । इतना ही नहीं, उसे अनायास ही इष्ट बन्धुओंसे मिलन होगा तथा कोई दुःख-शोक नहीं सतावेगा। धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ जो विद्वान् विद्वानोंको यह प्रसंग सुनायेगा, वह इस लोकमें यश और परलोकमें शुभ गति प्राप्त करेगा ॥ २८ ½ ॥ स्वाध्याययुक्ता मनुजास्तपोयुक्ताश्च भारत ॥ २९ ॥ साध्वाचारा दमोपेता दाननिर्धूतकल्मषाः ।