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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2403, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2403

जब तुमने यज्ञका अनुष्ठान आरम्भ किया, तभीसे देवतालोग तुम्हारे हितैषी सुहृद् हो

गये। जब इस प्रकार देवता मित्रभावसे युक्त होते हैं, तब वे जीवोंको लोकान्तरकी प्राप्ति

करानेमें समर्थ होनेके कारण उनपर अनुग्रह करके उन्हें अभीष्ट लोकोंकी प्राप्ति करा देते

हैं ।। १२ ।।

गतिमन्तश्च तेनेष्ट्वा नान्ये नित्या भवन्त्युत ।

नित्येऽस्मिन् पञ्चके वर्गे नित्ये चात्मनि पूरुषः ।। १३ ।।

अस्य नानासमायोगं यः पश्यति वृथामतिः ।

वियोगे शोचतेऽत्यर्थं स बाल इति मे मतिः ।। १४ ।।

इसलिये नित्य जीव यज्ञोंद्वारा देवताओंकी आराधना करके लोकान्तरमें जानेकी शक्ति

पाते हैं। जो यज्ञ नहीं करते, वे वैसे नहीं हो पाते। यह पाञ्चभौतिक वर्ग नित्य है और

आत्मा भी नित्य है। ऐसी दशामें जो मनुष्य उस आत्माका अनेक प्रकारके देहोंसे सम्बन्ध

तथा उनके जन्म और नाशसे आत्माका भी जन्म और नाश समझता है, उसकी बुद्धि व्यर्थ

है। इसी प्रकार किसीसे किसीका वियोग हो जानेपर जो अत्यन्त शोक करता है, वह भी मेरे

मतमें बालक ही है ।। १३-१४ ।।

वियोगे दोषदर्शी यः संयोगं स विसर्जयेत् ।

असङ्गे सङ्गमो नास्ति दुःखं भुवि वियोगजम् ।। १५ ।।

जो वियोगमें दोष देखता है, वह संयोगका त्याग कर दे; क्योंकि असंग आत्मामें संगम

या संयोग नहीं है। जो उसमें संयोगका आरोप करता है, उसीको इस भूतलपर वियोगका

दुःख सहना पड़ता है ।। १५ ।।

परापरज्ञस्त्वपरो नाभिमानादुदीरितः ।

अपरज्ञः परां बुद्धिं ज्ञात्वा मोहाद् विमुच्यते ।। १६ ।।

दूसरा जो अपने-परायेके ज्ञानमें ही उलझा रहता है, वह अभिमानसे ऊपर नहीं उठ

पाता। जो किसीके लिये पराया नहीं है, उस परमात्माको जाननेवाला पुरुष उत्तम बुद्धिको

पाकर मोहसे मुक्त हो जाता है ।। १६ ।।

अदर्शनादापतितः पुनश्चादर्शनं गतः ।

नाहं तं वेद्मि नासौ मां न च मेऽस्ति विरागता ।। १७ ।।

वह मुक्त पुरुष अव्यक्तसे ही प्रकट हुआ था और पुनः अव्यक्तमें ही लीन हो गया। न मैं

उसे जानता हूँ३ न वह मुझे३। (फिर तुम भी वैसे ही बन्धनमुक्त क्यों न हो गये? ऐसा प्रश्न

होनेपर कहते हैं।) मुझमें वैराग्य नहीं है (पर वैराग्य ही मोक्षका मुख्य साधन है।) ।। १७ ।।

येन येन शरीरेण करोत्ययमनीश्वरः ।

तेन तेन शरीरेण तदवश्यमुपाश्नुते ।

मानसं मनसाऽऽप्नोति शरीरं च शरीरवान् ।। १८ ।।