महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2406, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंसौति कहते हैं— राजा जनमेजयके इस प्रकार कहनेपर परम प्रतापी बुद्धिमान् महर्षि व्यासने उनपर भी कृपा की। उन्होंने राजा परीक्षित्को उस यज्ञभूमिमें बुला दिया ॥ ६ ॥ ततस्तद्रूपवयसमागतं नृपतिं दिवः । श्रीमन्तं पितरं राजा ददर्श जनमेजयः ॥ ७ ॥ स्वर्गसे उसी रूप और अवस्थामें आये हुए अपने तेजस्वी पिता राजा परीक्षित्का भूपाल जनमेजयने दर्शन किया ॥ ७ ॥ शमीकं च महात्मानं पुत्रं तं चास्य शृङ्गिणम् । अमात्या ये बभूवुश्च राज्ञस्तांश्च ददर्श ह ॥ ८ ॥ उनके साथ ही महात्मा शमीक और उनके पुत्र शृंगी ऋषि भी थे। राजा परीक्षित्के जो मन्त्री थे, उनका भी जनमेजयने दर्शन किया ॥ ८ ॥ ततः सोऽवभृथे राजा मुदितो जनमेजयः । पितरं स्नापयामास स्वयं सस्नौ च पार्थिवः ॥ ९ ॥ (परीक्षिदपि तत्रैव बभूव स तिरोहितः ।) तदनन्तर राजा जनमेजयने प्रसन्न होकर यज्ञान्तस्नानके समय पहले अपने पिताको नहलाया; फिर स्वयं स्नान किया। फिर राजा परीक्षित् वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ ९ ॥ स्नात्वा स नृपतिर्विप्रमास्तीकमिदमब्रवीत् । यायावरकुलोत्पन्नं जरत्कारुसुतं तदा ॥ १० ॥ स्नान करके उन नरेशने यायावरकुलमें उत्पन्न जरत्कारुकुमार आस्तीक मुनिसे इस प्रकार कहा— ॥ आस्तीक विविधाश्चर्यो यज्ञोऽयमिति मे मतिः । यदद्यायं पिता प्राप्तो मम शोकप्रणाशनः ॥ ११ ॥ ‘आस्तीकजी! मुझे तो ऐसा जान पड़ता है, मेरा यह यज्ञ नाना प्रकारके आश्चर्योंका केन्द्र हो रहा है; क्योंकि आज मेरे शोकोंका नाश करनेवाले ये पिताजी भी यहाँ उपस्थित हो गये थे’ ॥ ११ ॥
आस्तीक उवाच
ऋषिर्द्वैपायनो यत्र पुराणस्तपसो निधिः । यज्ञे कुरुकुलश्रेष्ठ तस्य लोकावुभौ जितौ ॥ १२ ॥ आस्तीक बोले— कुरुकुलश्रेष्ठ! राजन्! जिसके यज्ञमें तपस्याकी निधि पुरातन ऋषि महर्षि द्वैपायन व्यास विराजमान हों, उसकी तो दोनों लोकोंमें विजय है ॥ श्रुतं विचित्रमाख्यानं त्वया पाण्डवनन्दन । सर्पाश्च भस्मसान्नीता गताश्च पदवीं पितुः ॥ १३ ॥