महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2411, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंन मामर्हसि धर्मज्ञ परित्यक्तुमनागसम् ॥ २३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! जब राजा धृतराष्ट्रने वैसी बात कही, तब
युधिष्ठिरने उनसे इस प्रकार कहा—'धर्मके ज्ञाता महाराज! आप मेरा परित्याग न करें,
क्योंकि मैं सर्वथा निरपराध हूँ ॥ २३ ॥
कामं गच्छन्तु मे सर्वे भ्रातरोऽनुचरास्तथा ।
भवन्तमहमन्विष्ये मातरौ च यतव्रतः ॥ २४ ॥
'मेरे ये सब भाई और सेवक इच्छा हो तो चले जायें; किंतु मैं नियम और व्रतका पालन
करता हुआ आपकी तथा इन दोनों माताओंकी सेवा करूँगा ॥ २४ ॥
तमुवाचाथ गान्धारी मैवं पुत्र शृणुष्व च ।
त्वय्यधीनं कुरुकुलं पिण्डश्च श्वशुरस्य मे ॥ २५ ॥
गम्यतां पुत्र पर्याप्तमेतावत् पूजिता वयम् ।
राजा यदाह तत् कार्यं त्वया पुत्र पितुर्वचः ॥ २६ ॥
यह सुनकर गान्धारीने कहा—'बेटा! ऐसी बात न कहो। मैं जो कहती हूँ उसे सुनो। यह
सारा कुरुकुल तुम्हारे ही अधीन है। मेरे श्वशुरका पिण्ड भी तुमपर ही अवलम्बित है; अतः
पुत्र! तुम जाओ, तुमने हमारे लिये जितना किया है, वही बहुत है। तुम्हारे द्वारा हमलोगोंका
स्वागत-सत्कार भलीभाँति हो चुका है। इस समय महाराज जो आज्ञा दे रहे हैं, वही करो;
क्योंकि पिताका वचन मानना तुम्हारा कर्तव्य है' ॥ २५-२६ ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्तः स तु गान्धार्या कुन्तीमिदमभाषत ।
स्नेहबाष्पाकुले नेत्रे प्रमृज्य रुदतीं वचः ॥ २७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! गान्धारीके इस प्रकार आदेश देनेपर राजा
युधिष्ठिरने अपने आँसूभरे नेत्रोंको पोंछकर रोती हुई कुन्तीसे कहा— ॥ २७ ॥
विसर्जयति मां राजा गान्धारी च यशस्विनी ।
भवत्यां बद्धचित्तस्तु कथं यास्यामि दुःखितः ॥ २८ ॥
'माँ! राजा और यशस्विनी गान्धारीदेवी भी मुझे घर लौटनेकी आज्ञा दे रही हैं; किंतु
मेरा मन आपमें लगा हुआ है। जानेका नाम सुनकर ही मैं बहुत दुखी हो जाता हूँ। ऐसी
दशामें मैं कैसे जा सकूँगा? ॥ २८ ॥
न चोत्सहे तपोविघ्नं कर्तुं ते धर्मचारिणि ।
तपसो हि परं नास्ति तपसा विन्दते महत् ॥ २९ ॥
'धर्मचारिणि! मैं आपकी तपस्यामें विघ्न डालना नहीं चाहता; क्योंकि तपसे बढ़कर
कुछ नहीं है। (निष्काम भावपूर्वक) तपस्यासे परब्रह्म परमात्माकी भी प्राप्ति हो जाती
है ॥ २९ ॥