भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2422, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2422

यददृच्छयानुव्रजता मया राज्ञः कलेवरम् ।। ३५ ।।
तयोश्च देव्योरुभयोर्मया दृष्टानि भारत ।
भरतनन्दन! वनमें घूमते समय अकस्मात् राजा धृतराष्ट्र तथा उन देवियोंके मृत शरीर मेरी दृष्टिमें पड़े थे ।। ३५ १/२ ।।
ततस्तपोवने तस्मिन् समाजग्मुस्तपोधनाः ।। ३६ ।।
श्रुत्वा राज्ञस्तदा निष्ठां न त्वशोचन् गतींश्च ते ।
तदनन्तर राजाकी मृत्युका समाचार सुनकर बहुत-से तपोधन उस तपोवनमें आये। उन्होंने उनके लिये कोई शोक नहीं किया; क्योंकि उन तीनोंकी सद्गतिके विषयमें उनके मनमें संशय नहीं था ।। ३६ १/२ ।।
तत्राश्रौषमहं सर्वमेतत् पुरुषसत्तम ।। ३७ ।।
यथा च नृपतिर्दग्धो देव्यौ ते चेति पाण्डव ।
पुरुषप्रवर पाण्डव! जिस प्रकार राजा धृतराष्ट्र तथा उन दोनों देवियोंका दाह हुआ है, यह सारा समाचार मैंने वहीं सुना था ।। ३७ १/२ ।।
न शोचितव्यं राजेन्द्र स्वतः स पृथिवीपतिः ।। ३८ ।।
प्राप्तवानग्निसंयोगं गान्धारी जननी च ते ।
राजेन्द्र! राजा धृतराष्ट्र, गान्धारी और तुम्हारी माता कुन्ती—तीनोंने स्वतः अग्निसंयोग प्राप्त किया था; अतः उनके लिये तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये ।। ३८ १/२ ।।

वैशम्पायन उवाच

एतच्छ्रुत्वा च सर्वेषां पाण्डवानां महात्मनाम् ।। ३९ ।।
निर्याणं धृतराष्ट्रस्य शोकः समभवन्महान् ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! राजा धृतराष्ट्रका यह परलोकगमनका समाचार सुनकर उन सभी महामना पाण्डवोंको बड़ा शोक हुआ ।। ३९ १/२ ।।
अन्तःपुराणां च तदा महानार्तस्वरोऽभवत् ।। ४० ।।
पौराणां च महाराज श्रुत्वा राजंस्तदा गतिम् ।
महाराज! उनके अन्तःपुरमें उस समय महान् आर्तनाद होने लगा। राजाकी वैसी गति सुनकर पुरवासियोंमें भी हाहाकार मच गया ।। ४० १/२ ।।
अहो धिगिति राजा तु विक्रुश्य भृशदुःखितः ।। ४१ ।।
ऊर्ध्वबाहुः स्मरन् मातुः प्ररुरोद युधिष्ठिरः ।
'अहो! धिक्कार है!' इस प्रकार अपनी निन्दा करके राजा युधिष्ठिर बहुत दुःखी हो गये तथा दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर अपनी माताको याद करके फूट-फूटकर रोने लगे ।। ४१ १/२ ।।
भीमसेनपुरोगाश्च भ्रातरः सर्व एव ते ।। ४२ ।।