महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2426, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंजिन्होंने पहले इस पृथ्वीका शासन करके अन्तमें वैसी कठोर तपस्याका आश्रय लिया था, उन कुरुवंशी राजर्षिको ऐसी मृत्यु क्यों प्राप्त हुई? ।। १४ १/२ ।। तिष्ठत्सु मन्त्रपूतेषु तस्याग्निषु महावने ।। १५ ।। वृथाग्निना समायुक्तो निष्ठां प्राप्तः पिता मम । हाय, उस महान् वनमें मन्त्रोंसे पवित्र हुई अग्नियोंके रहते हुए भी मेरे ताऊ लौकिक अग्निसे दग्ध होकर क्यों मृत्युको प्राप्त हुए? ।। १५ १/२ ।। मन्ये पृथा वेपमाना कृशा धमनिसंतता ।। १६ ।। हा तात! धर्मराजेति समाक्रन्दन्महाभये । मैं तो समझता हूँ कि अत्यन्त दुर्बल हो जानेके कारण जिनके शरीरमें फैली हुई नस-नाड़ियोंतक स्पष्ट दिखायी देती थीं, वे मेरी माता कुन्ती अग्निका महान् भय उपस्थित होनेपर ‘हा तात! हा धर्मराज!’ कहकर कातर पुकार मचाने लगी होंगी ।। १६ १/२ ।। भीम पर्याप्नुहि भयादिति चैवाभिवाशती ।। १७ ।। समन्ततः परिक्षिप्ता माताभून्मे दवाग्निना । ‘भीमसेन! इस भयसे मुझे बचाओ, ऐसा कहकर चारों ओर चीखती-चिल्लाती हुई मेरी माताको दावानलने जलाकर भस्म कर दिया होगा ।। १७ १/२ ।। सहदेवः प्रियस्तस्याः पुत्रेभ्योऽधिक एव तु ।। १८ ।। न चैनां मोक्षयामास वीरो माद्रवतीसुतः । सहदेव मेरी माताको अपने सभी पुत्रोंसे अधिक प्रिय था; परंतु वह वीर माद्रीकुमार भी माँको उस संकटसे बचा न सका ।। १८ १/२ ।। तच्छ्रुत्वा रुरुदुः सर्वे समालिङ्ग्य परस्परम् ।। १९ ।। पाण्डवाः पञ्च दुःखार्ता भूतानीव युगक्षये । यह सुनकर समस्त पाण्डव एक-दूसरेको हृदयसे लगाकर रोने लगे। जैसे प्रलयकालमें पाँचों भूत पीड़ित हो जाते हैं, उसी प्रकार उस समय पाँचों पाण्डव दुःखसे आतुर हो उठे ।। १९ १/२ ।। तेषां तु पुरुषेन्द्राणां रुदतां रुदितस्वनः ।। २० ।। प्रासादाभोगसंरुद्धे अन्वरौत्सीत् स रोदसी ।। २१ ।। वहाँ रोदन करते हुए उन पुरुषप्रवर पाण्डवोंके रोनेका शब्द महलके विस्तारसे अवरुद्ध हुए भूतल और आकाशमें गूँजने लगा ।। २०-२१ ।।
इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि नारदागमनपर्वणि युधिष्ठिरविलापे अष्टात्रिंशोऽध्यायः ।। ३८ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत नारदागमनपर्वमें युधिष्ठिरका विलापविषयक अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३८ ।।