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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2438, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2438

उच्छेत्तारः कुलं कृत्स्नमृते रामजनार्दनौ ॥ २० ॥ समुद्रं यास्यति श्रीमांस्त्यक्त्वा देहं हलायुधः । जरा कृष्णं महात्मानं शयानं भुवि भेत्स्यति ॥ २१ ॥ इत्यब्रुवन्त ते राजन् प्रलब्धास्तैर्दुरात्मभिः । मुनयः क्रोधरक्ताक्षाः समीक्ष्याथ परस्परम् ॥ २२ ॥ राजन्! उन दुर्बुद्धि बालकोंके वञ्चनापूर्ण बर्तावसे वे सभी महर्षि कुपित हो उठे। क्रोधसे उनकी आँखें लाल हो गयीं और वे एक-दूसरेकी ओर देखकर इस प्रकार बोले—'क्रूर, क्रोधी और दुराचारी यादवकुमारो! भगवान् श्रीकृष्णका यह पुत्र साम्ब एक भयंकर लोहेका मूसल उत्पन्न करेगा जो वृष्णि और अन्धकवंशके विनाशका कारण होगा। उसीसे तुम लोग बलराम और श्रीकृष्णके सिवा अपने शेष समस्त कुलका संहार कर डालोगे। हलधारी श्रीमान् बलरामजी स्वयं ही अपने शरीरको त्यागकर समुद्रमें चले जायँगे और महात्मा श्रीकृष्ण जब भूतलपर सो रहे होंगे उस समय जरा नामक व्याध उन्हें अपने बाणोंसे बींध डालेगा ॥ १९—२२ ॥ तथोक्त्वा मुनयस्ते तु ततः केशवमभ्ययुः । अथाब्रवीत् तदा वृष्णीन् श्रुत्वैवं मधुसूदनः ॥ २३ ॥ ऐसा कहकर वे मुनि भगवान् श्रीकृष्णके पास चले गये। (वहाँ उन्होंने उनसे सारी बातें कह सुनायीं।) यह सब सुनकर भगवान् मधुसूदनने वृष्णिवंशियोंसे कहा— ॥ २३ ॥ अन्तज्ञो मतिमांस्तस्य भवितव्यं तथेति तान् । एवमुक्त्वा हृषीकेशः प्रविवेश पुरं तदा ॥ २४ ॥ 'ऋषियोंने जैसा कहा है, वैसा ही होगा।' बुद्धिमान् श्रीकृष्ण सबके अन्तको जाननेवाले हैं। उन्होंने उपर्युक्त बात कहकर नगरमें प्रवेश किया ॥ २४ ॥ कृतान्तमन्यथा नैच्छत् कर्तुं स जगतः प्रभुः । श्वोभूतेऽथ ततः साम्बो मुसलं तदसूत वै ॥ २५ ॥ यद्यपि भगवान् श्रीकृष्ण सम्पूर्ण जगत्के ईश्वर हैं तथापि यदुवंशियोंपर आनेवाले उस कालको उन्होंने पलटनेकी इच्छा नहीं की। दूसरे दिन सबेरा होते ही साम्बने उस मूसलको जन्म दिया ॥ २५ ॥ येन वृष्ण्यन्धककुले पुरुषा भस्मसात् कृताः । वृष्ण्यन्धकविनाशाय किंकरप्रतिमं महत् ॥ २६ ॥ वह वही मूसल था जिसने वृष्णि और अन्धककुलके समस्त पुरुषोंको भस्मसात् कर दिया। वृष्णि और अन्धक वंशके वीरोंका विनाश करनेके लिये वह महान् यमदूतके ही तुल्य था ॥ २६ ॥ असूत शापजं घोरं तच्च राज्ञे न्यवेदयन् । विषण्णरूपस्तद् राजा सूक्ष्मं चूर्णमकारयत् ॥ २७ ॥

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व · पृष्ठ 2438, कुल 2566 में से · BharatKosha