महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतथान्यानपि निघ्नन्तं युयुधानं समन्ततः । अभ्यधावद्धृषीकेशो विनिवारयितुं तदा ॥ २९ ॥ फिर वे दूसरे-दूसरे लोगोंका भी सब ओर घूमकर वध करने लगे। यह देख भगवान् श्रीकृष्ण उन्हें रोकनेके लिये दौड़े ॥ २९ ॥ एकीभूतास्ततः सर्वे कालपर्यायचोदिताः । भोजान्धका महाराज शैनेयं पर्यवारयन् ॥ ३० ॥ महाराज! इतनेहीमें कालकी प्रेरणासे भोज और अन्धकवंशके समस्त वीरोंने एकमत होकर सात्यकिको चारों ओरसे घेर लिया ॥ ३० ॥ तान् दृष्ट्वा पततस्तूर्णमभिक्रुद्धान् जनार्दनः । न चुक्रोध महातेजा जानन् कालस्य पर्ययम् ॥ ३१ ॥ उन्हें कुपित होकर तुरंत धावा करते देख महातेजस्वी श्रीकृष्ण कालके उलट-फेरको जाननेके कारण कुपित नहीं हुए ॥ ३१ ॥ ते तु पानमदाविष्टाश्चोदिताः कालधर्मणा । युयुधानमथाभ्यघ्नन्नुच्छिष्टैर्भाजनैस्तदा ॥ ३२ ॥ वे सब-के-सब मदिरापानजनित मदके आवेशसे उन्मत्त हो उठे थे। इधर कालधर्मा मृत्यु भी उन्हें प्रेरित कर रहा था। इसलिये वे जूठे बरतनोंसे सात्यकिपर आघात करने