महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2450, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंअविध्यन् विध्यते राजन् प्रक्षिपन्ति स्म यत् तृणम् ।। ४० ।।
तद् वज्रभूतं मुसलं व्यदृश्यत तदा दृढम् ।
राजन्! वे जिस किसी भी तृणका प्रहार करते वह अभेद्य वस्तुका भी भेदन कर डालता था और वज्रमय मूसलके समान सुदृढ़ दिखायी देता था ।। ४० १/२ ।।
अवधीत् पितरं पुत्रः पिता पुत्रं च भारत ।। ४१ ।।
मत्ताः परिपतन्ति स्म योधयन्तः परस्परम् ।
पतङ्गा इव चाग्नौ ते निपेतुः कुकुरान्धकाः ।। ४२ ।।
भरतनन्दन! उस मूसलसे पिताने पुत्रको और पुत्रने पिताको मार डाला। जैसे पतंगे अतामें कूद पड़ते हैं, उसी प्रकार कुकुर और अन्धकवंशके लोग परस्पर जूझते हुए एक दूसरेपर मतवाले होकर टूटते थे ।। ४१-४२ ।।
नासीत् पलायने बुद्धिर्वध्यमानस्य कस्यचित् ।
तत्रापश्यन्महाबाहुर्जानीन् कालस्य पर्ययम् ।। ४३ ।।
मुसलं समवष्टभ्य तस्थौ स मधुसूदनः ।
वहाँ मारे जानेवाले किसी योद्धाके मनमें वहाँसे भाग जानेका विचार नहीं होता था। कालचक्रके इस परिवर्तनको जानते हुए महाबाहु मधुसूदन वहाँ चुपचाप सब कुछ देखते रहे और मूसलका सहारा लेकर खड़े रहे ।। ४३ १/२ ।।
साम्बं च निहतं दृष्ट्वा चारुदेष्णं च माधवः ।। ४४ ।।
प्रद्युम्नं चानिरुद्धं च ततश्चुक्रोध भारत ।
भारत! श्रीकृष्ण जब अपने पुत्र साम्ब, चारुदेष्ण और प्रद्युम्नको तथा पोते अनिरुद्धको भी मारा गया देखा तब उनकी क्रोधाग्नि प्रज्वलित हो उठी ।। ४४ १/२ ।।
गदं वीक्ष्य शयानं च भृशं कोपसमन्वितः ।। ४५ ।।
स निःशेषं तदा चक्रे शार्ङ्गचक्रगदाधरः ।
अपने छोटे भाई गदको रणशय्यापर पड़ा देख वे अत्यन्त रोषसे आगबबूला हो उठे; फिर तो शार्ङ्गधनुष, चक्र और गदा धारण करनेवाले श्रीकृष्णने उस समय शेष बचे हुए समस्त यादवोंका संहार कर डाला ।। ४५ १/२ ।।
तन्निघ्नन्तं महातेजा बभ्रुः परपुरञ्जयः ।। ४६ ।।
दारुकश्चैव दाशार्हमूचतुर्यन्निबोध तत् ।
शत्रुओंकी नगरीपर विजय पानेवाले महातेजस्वी बभ्रु और दारुकने उस समय यादवोंका संहार करते हुए श्रीकृष्णसे जो कुछ कहा, उसे सुनो ।। ४६ १/२ ।।
भगवन् निहताः सर्वे त्वया भूयिष्ठशो नराः ।
रामस्य पदमन्विच्छ तत्र गच्छाम यत्र सः ।। ४७ ।।