महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2457, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रत्युद्गम्य स्वागतेनाभ्यनन्दं- स्तेऽपूजयंश्चार्घ्यपाद्यक्रियाभिः । ततो गते भ्रातरि वासुदेवो जानन् सर्वा गतयो दिव्यदृष्टिः ॥ १७ ॥ वने शून्ये विचरंश्चिन्तयानो भूमौ चाथ संविवेशाग्र्यतेजाः । सर्वं तेन प्राक्तदा वित्तमासीद् गान्धार्या यद् वाक्यमुक्तः स पूर्वम् ॥ १८ ॥ उपर्युक्त सब लोगोंने आगे बढ़कर उनकी अगवानी की, स्वागतपूर्वक अभिनन्दन किया और अर्घ्य-पाद्य आदि उपचारोंद्वारा उनकी पूजा सम्पन्न की। भाई बलरामके परम धाम पधारनेके पश्चात् सम्पूर्ण गतियोंको जाननेवाले दिव्यदर्शी भगवान् श्रीकृष्ण कुछ सोचते-विचारते हुए उस सूने वनमें विचरने लगे। फिर वे श्रेष्ठ तेजवाले भगवान् पृथ्वीपर बैठ गये। सबसे पहले उन्होंने वहाँ उस समय उन सारी बातोंको स्मरण किया, जिन्हें पूर्वकालमें गान्धारी देवीने कहा था ॥ १७-१८ ॥
दुर्वाससा पायसोच्छिष्टलिप्ते यच्चाप्युक्तं तच्च सस्मार वाक्यम् । स चिन्तयन्नन्धकवृष्णिनाशं कुरुक्षयं चैव महानुभावः ॥ १९ ॥ जूठी खीरको शरीरमें लगानेके समय दुर्वासाने जो बात कही थी उसका भी उन्हें स्मरण हो आया। फिर वे महानुभाव श्रीकृष्ण अन्धक, वृष्णि और कुरुकुलके विनाशकी बात सोचने लगे ॥ १९ ॥
मेने ततः संक्रमणस्य कालं ततश्चकारेन्द्रियसन्निरोधम् । तथा च लोकत्रयपालनार्थ- मात्रेयवाक्यप्रतिपालनाय ॥ २० ॥ तत्पश्चात् उन्होंने तीनों लोकोंकी रक्षा तथा दुर्वासाके वचनका पालन करनेके लिये अपने परम धाम पधारनेका उपयुक्त समय प्राप्त हुआ समझा तथा इसी उद्देश्यसे अपनी सम्पूर्ण इन्द्रिय-वृत्तियोंका निरोध किया ॥ २० ॥
देवोऽपि सन् देहविमोक्षहेतो- र्निमित्तमैच्छत् सकलार्थतत्त्ववित् । स संनिरुद्धेन्द्रियवाङ्मनास्तु शिश्ये महायोगमुपेत्य कृष्णः ॥ २१ ॥