महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2486, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंकृतकृत्यानि चास्त्राणि गतान्यद्य यथागतम् ॥ ३५ ॥
पुनरेष्यन्ति ते हस्ते यदा कालो भविष्यति ।
तुम्हारे अस्त्र-शस्त्रोंका प्रयोजन भी पूरा हो गया है; इसलिये वे जैसे मिले थे वैसे ही चले गये। जब उपयुक्त समय होगा तब वे फिर तुम्हारे हाथमें आयेंगे ॥
कालो गन्तुं गतिं मुख्यां भवतामपि भारत ॥ ३६ ॥
एतत् श्रेयो हि वो मन्ये परमं भरतर्षभ ।
भारत! अब तुमलोगोंके उत्तम गति प्राप्त करनेका समय उपस्थित है। भरतश्रेष्ठ! मुझे इसीमें तुमलोगोंका परम कल्याण जान पड़ता है ॥ ३६ १/२ ॥
वैशम्पायन उवाच
एतद् वचनमाज्ञाय व्यासस्यामिततेजसः ॥ ३७ ॥
अनुज्ञातो ययौ पार्थो नगरं नागसाह्वयम् ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! अमिततेजस्वी व्यासजीके इस वचनका तत्त्व समझकर अर्जुन उनकी आज्ञा ले हस्तिनापुरको चले गये ॥ ३७ १/२ ॥
प्रविश्य च पुरीं वीरः समासाद्य युधिष्ठिरम् ।
आचष्ट तद् यथावृत्तं वृष्ण्यन्धककुलं प्रति ॥ ३८ ॥
नगरमें प्रवेश करके वीर अर्जुन युधिष्ठिरसे मिले और वृष्णि तथा अन्धकवंशका यथावत् समाचार उन्होंने कह सुनाया ॥ ३८ ॥
इति श्रीमहाभारते मौसलपर्वणि व्यासार्जुनसंवादे अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत मौसलपर्वमें व्यास और अर्जुनका संवादविषयक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ४१ १/२ श्लोक हैं)
॥ मौसलपर्व सम्पूर्ण ॥
| अनुष्टुप् | (अन्य बड़े छन्द) | बड़े छन्दोंको ३२ अक्षरोंके<br>अनुष्टुप् मानकर गिननेपर | कुलयोग | |
|---|---|---|---|---|
| उत्तर भारतीय पाठसे लिये गये | २६० | (३०) | ४१ । | ३०१ । |
| दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये | ३ ॥ | ३ ॥ | ||
| मौसलपर्वकी कुल श्लोकसंख्या — | ३०४।। |