महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसबके उद्देश्यसे विधिपूर्वक श्राद्ध किया ।। द्वैपायनं नारदं च मार्कण्डेयं तपोधनम् । भारद्वाजं याज्ञवल्क्यं हरिमुद्दिश्य यत्नवान् ॥ १२ ॥ अभोजयत् स्वादु भोज्यं कीर्तयित्वा च शार्ङ्गिणम् । ददौ रत्नानि वासांसि ग्रामानश्वान् रथांस्तथा ॥ १३ ॥ स्त्रियश्च द्विजमुख्येभ्यस्तदा शतसहस्रशः । प्रयत्नशील युधिष्ठिरने भगवान् श्रीकृष्णके उद्देश्यसे द्वैपायन व्यास, देवर्षि नारद, तपोधन मार्कण्डेय, भारद्वाज और याज्ञवल्क्य मुनिको सुस्वादु भोजन कराया। भगवान्का नाम कीर्तन करके उन्होंने उत्तम ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके रत्न, वस्त्र, ग्राम, घोड़े और रथ प्रदान किये। बहुत-से ब्राह्मणशिरोमणियोंको लाखों कुमारी कन्याएँ दीं ।।
कृपमभ्यर्च्य च गुरुमथ पौरपुरस्कृतम् ॥ १४ ॥ शिष्यं परिक्षितं तस्मै ददौ भरतसत्तमः । तत्पश्चात् गुरुवर कृपाचार्यकी पूजा करके पुरवासियों-सहित परीक्षित्को शिष्यभावसे उनकी सेवामें सौंप दिया ।।
ततस्तु प्रकृतीः सर्वाः समानाय्य युधिष्ठिरः ॥ १५ ॥ सर्वमाचष्ट राजर्षिश्चिकीर्षितमथात्मनः । इसके बाद समस्त प्रकृतियों (प्रजा-मन्त्री आदि)-को बुलाकर राजर्षि युधिष्ठिरने, वे जो कुछ करना चाहते थे अपना वह सारा विचार उनसे कह सुनाया ।।
ते श्रुत्वैव वचस्तस्य पौरजानपदा जनाः ॥ १६ ॥ भृशमुद्विग्नमनसो नाभ्यनन्दन्त तद्वचः । नैवं कर्तव्यमिति ते तदोचुस्तं जनाधिपम् ॥ १७ ॥ उनकी वह बात सुनते ही नगर और जनपदके लोग मन-ही-मन अत्यन्त उद्विग्न हो उठे। उन्होंने उस प्रस्तावका स्वागत नहीं किया। वे सब राजासे एक साथ बोले—‘आपको ऐसा नहीं करना चाहिये (आप हमें छोड़कर कहीं न जायँ)' ।। १६-१७ ।।
न च राजा तथाकार्षीत् कालपर्यायधर्मवित् । परंतु धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर कालके उलट-फेरके अनुसार जो धर्म या कर्तव्य प्राप्त था उसे जानते थे; अतः उन्होंने प्रजाके कथनानुसार कार्य नहीं किया ।।
ततोऽनुमान्य धर्मात्मा पौरजानपदं जनम् ॥ १८ ॥ गमनाय मतिं चक्रे भ्रातरश्चास्य ते तदा । उन धर्मात्मा नरेशने नगर और जनपदके लोगोंको समझा-बुझाकर उनकी अनुमति प्राप्त कर ली। फिर उन्होंने और उनके भाइयोंनै सब कुछ त्यागकर महा-प्रस्थान करनेका ही निश्चय किया ।। १८ १/२ ।।
ततः स राजा कौरव्यो धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ १९ ॥