भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2492, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2492

शिष्टाः परिक्षितं त्वन्या मातरः पर्यवारयन् ।। २८ ।। जनमेजय! नागराजकी कन्या उलूपी उसी समय गंगाजीमें समा गयी। चित्रांगदा मणिपुर नगरमें चली गयी। तथा शेष माताएँ परीक्षित्‌को घेरे हुए पीछे लौट आयीं ।। २७-२८ ।।

पाण्डवाश्च महात्मानो द्रौपदी च यशस्विनी । कृतोपवासाः कौरव्य प्रययुः प्राङ्मुखास्ततः ।। २९ ।। कुरुनन्दन! तदनन्तर महात्मा पाण्डव और यशस्विनी द्रौपदीदेवी सब-के-सब उपवासका व्रत लेकर पूर्वदिशाकी ओर मुँह करके चल दिये ।। २९ ।।

योगयुक्ता महात्मानस्त्यागधर्ममुपेयुषः । अभिजग्मुर्बहून् देशान् सरितः सागरांस्तथा ।। ३० ।। वे सब-के-सब योगयुक्त महात्मा तथा त्याग-धर्मका पालन करनेवाले थे। उन्होंने अनेक देशों, नदियों और समुद्रोंकी यात्रा की ।। ३० ।।

युधिष्ठिरो ययावग्रे भीमस्तु तदनन्तरम् । अर्जुनस्तस्य चान्वेव यमौ चापि यथाक्रमम् ।। ३१ ।। आगे-आगे युधिष्ठिर चलते थे। उनके पीछे भीमसेन थे। भीमसेनके भी पीछे अर्जुन थे और उनके भी पीछे क्रमशः नकुल और सहदेव चल रहे थे ।। ३१ ।।

पृष्ठतस्तु वरारोहा श्यामा पद्मदलेक्षणा । द्रौपदी योषितां श्रेष्ठा ययौ भरतसत्तम ।। ३२ ।। भरतश्रेष्ठ! इन सबके पीछे सुन्दर शरीरवाली, श्यामवर्णा, कमलदललोचना, युवतियोंमें श्रेष्ठ द्रौपदी चल रही थी ।। ३२ ।।

श्वा चैवानुययावेकः प्रस्थितान् पाण्डवान् वनम् । क्रमेण ते ययुर्वीरा लौहित्यं सलिलार्णवम् ।। ३३ ।। वनको प्रस्थित हुए पाण्डवोंके पीछे एक कुत्ता भी चला जा रहा था। क्रमशः चलते हुए वे वीर पाण्डव लालसागरके तटपर जा पहुँचे ।। ३३ ।।

गाण्डीवं तु धनुर्दिव्यं न मुमोच धनंजयः । रत्नलोभान् महाराज ते चाक्षय्ये महेषुधी ।। ३४ ।। महाराज! अर्जुनने दिव्यरत्नके लोभसे अभीतक अपने दिव्य गाण्डीव धनुष तथा दोनों अक्षय तूणीरोंका परित्याग नहीं किया था ।। ३४ ।।

अग्निं ते ददृशुस्तत्र स्थितं शैलमिवाग्रतः । मार्गमावृत्य तिष्ठन्तं साक्षात्पुरुषविग्रहम् ।। ३५ ।। वहाँ पहुँचकर उन्होंने पर्वतकी भाँति मार्ग रोककर सामने खड़े हुए पुरुषरूपधारी साक्षात् अग्निदेवको देखा ।।