महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2494, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंचक्ररत्नं तु यत् कृष्णे स्थितमासीन्महात्मनि । गतं तच्च पुनर्हस्ते कालेनैष्यति तस्य ह ॥ ४० ॥ 'पहले जो चक्ररत्न महात्मा श्रीकृष्णके हाथमें था वह चला गया। वह पुनः समय आनेपर उनके हाथमें जायगा ॥ ४० ॥
वरुणादाहृतं पूर्वं मयैतत् पार्थकारणात् । गाण्डीवं धनुषां श्रेष्ठं वरुणायैव दीयताम् ॥ ४१ ॥ 'यह गाण्डीव धनुष सब प्रकारके धनुषोंमें श्रेष्ठ है। इसे पहले मैं अर्जुनके लिये ही वरुणसे माँगकर ले आया था। अब पुनः इसे वरुणको वापस कर देना चाहिये' ॥ ४१ ॥
ततस्ते भ्रातरः सर्वे धनंजयमचोदयन् । स जले प्राक्षिपच्चैतत्तथाक्षय्ये महेषुधी ॥ ४२ ॥ यह सुनकर उन सब भाइयोंने अर्जुनको वह धनुष त्याग देनेके लिये कहा। तब अर्जुनने वह धनुष और दोनों अक्षय तरकस पानीमें फेंक दिये ॥ ४२ ॥
ततोऽग्निर्भरतश्रेष्ठ तत्रैवान्तरधीयत । ययुश्च पाण्डवा वीरास्ततस्ते दक्षिणामुखाः ॥ ४३ ॥ भरतश्रेष्ठ! इसके बाद अग्निदेव वहीं अन्तर्धान हो गये और पाण्डववीर वहाँसे दक्षिणाभिमुख होकर चल दिये ॥
ततस्ते तूत्तरेणैव तीरेण लवणाम्भसः । जग्मुर्भरतशार्दूल दिशं दक्षिणपश्चिमाम् ॥ ४४ ॥ भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर वे लवणसमुद्रके उत्तर तटपर होते हुए दक्षिण-पश्चिमदिशाकी ओर अग्रसर होने लगे ॥
ततः पुनः समावृत्ताः पश्चिमां दिशमेव ते । ददृशुर्द्वारकां चापि सागरेण परिप्लुताम् ॥ ४५ ॥ उदीचीं पुनरावृत्य ययुर्भरतसत्तमाः । प्रादक्षिण्यं चिकीर्षन्तः पृथिव्या योगधर्मिणः ॥ ४६ ॥ इसके बाद वे केवल पश्चिम दिशाकी ओर मुड़ गये। आगे जाकर उन्होंने समुद्रमें डुबी हुई द्वारकापुरीको देखा। फिर योगधर्ममें स्थित हुए भरतभूषण पाण्डवोंने वहाँसे लौटकर पृथ्वीकी परिक्रमा पूरी करनेकी इच्छासे उत्तर दिशाकी ओर यात्रा की ॥ ४५-४६ ॥
इति श्रीमहाभारते महाप्रस्थानिके पर्वणि प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत महाप्रस्थानिकपर्वमें पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥