महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2498, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंहमारा प्रियबन्धु नकुल क्यों पृथ्वीपर गिरा है?' ।। १४ ।।
इत्युक्तो भीमसेनेन प्रत्युवाच युधिष्ठिरः ।
नकुलं प्रति धर्मात्मा सर्वबुद्धिमतां वरः ॥ १५ ॥
भीमसेनके इस प्रकार पूछनेपर समस्त बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ धर्मात्मा युधिष्ठिरने नकुलके विषयमें इस प्रकार उत्तर दिया— ।। १५ ।।
रूपेण मत्समो नास्ति कश्चिदित्यस्य दर्शनम् ।
अधिकश्चाहमेवैक इत्यस्य मनसि स्थितम् ॥ १६ ॥
नकुलः पतितस्तस्मादागच्छ त्वं वृकोदर ।
यस्य यद् विहितं वीर सोऽवश्यं तदुपाश्नुते ॥ १७ ॥
‘भीमसेन! नकुलकी दृष्टि सदा ऐसी रही है कि रूपमें मेरे समान दूसरा कोई नहीं है। इसके मनमें यही बात बैठी रहती थी कि ‘एकमात्र मैं ही सबसे अधिक रूपवान् हूँ।’ इसीलिये नकुल नीचे गिरा है। तुम आओ। वीर! जिसकी जैसी करनी है वह उसका फल अवश्य भोगता है ॥ १६-१७ ॥
तांस्तु प्रपतितान् दृष्ट्वा पाण्डवः श्वेतवाहनः ।
पपात शोकसन्तप्तस्ततो नु परवीरहा ॥ १८ ॥
द्रौपदी तथा नकुल और सहदेव तीनों गिर गये, यह देखकर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले श्वेत-वाहन पाण्डुपुत्र अर्जुन शोकसे संतप्त हो स्वयं भी गिर पड़े ॥ १८ ॥
तस्मिंस्तु पुरुषव्याघ्रे पतिते शक्रतेजसि ।
म्रियमाणे दुराधर्षे भीमो राजानमब्रवीत् ॥ १९ ॥
इन्द्रके समान तेजस्वी दुर्धर्ष वीर पुरुषसिंह अर्जुन जब पृथ्वीपर गिरकर प्राणत्याग करने लगे उस समय भीमसेनने राजा युधिष्ठिरसे पूछा ॥ १९ ॥
अनृतं न स्मराम्यस्य स्वैरेष्वपि महात्मनः ।
अथ कस्य विकारोऽयं येनायं पतितो भुवि ॥ २० ॥
‘भैया! महात्मा अर्जुन कभी परिहासमें भी झूठ बोले हों—ऐसा मुझे याद नहीं आता। फिर यह किस कर्मका फल है जिससे इन्हें पृथ्वीपर गिरना पड़ा?’ ॥ २० ॥
युधिष्ठिर उवाच
एकाह्ना निर्दहेयं वै शत्रूनित्यर्जुनोऽब्रवीत् ।
न च तत् कृतवानेष शूरमानी ततोऽपतत् ॥ २१ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**अर्जुनको अपनी शूरताका अभिमान था। इन्होंने कहा था कि ‘मैं एक ही दिनमें शत्रुओंको भस्म कर डालूँगा’; किंतु ऐसा किया नहीं; इसीसे आज इन्हें धराशायी होना पड़ा है ॥ २१ ॥
अवमेने धनुर्ग्राहानेष सर्वांश्च फाल्गुनः ।