भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2502, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2502

युधिष्ठिर उवाच

भक्तत्यागं प्राहुरत्यन्तपापं

तुल्यं लोके ब्रह्मवध्याकृतेन ।

तस्मान्नाहं जातु कथंचनाद्य

त्यक्ष्याम्येनं स्वसुखार्थी महेन्द्र ॥ ११ ॥

युधिष्ठिर बोले—महेन्द्र! भक्तका त्याग करनेसे जो पाप होता है, उसका अन्त कभी

नहीं होता—ऐसा महात्मा पुरुष कहते हैं। संसारमें भक्तका त्याग ब्रह्महत्याके समान माना

गया है; अतः मैं अपने सुखके लिये कभी किसी तरह भी आज इस कुत्तेका त्याग नहीं

करूँगा ॥ ११ ॥

भीतं भक्तं नान्यदस्तीति चार्तं

प्राप्तं क्षीणं रक्षणे प्राणलिप्सुम् ।

प्राणत्यागादप्यहं नैव मोक्तुं

यतेयं वै नित्यमेतद् व्रतं मे ॥ १२ ॥

जो डरा हुआ हो, भक्त हो, मेरा दूसरा कोई सहारा नहीं है—ऐसा कहते हुए

आर्तभावसे शरणमें आया हो, अपनी रक्षामें असमर्थ—दुर्बल हो और अपने प्राण बचाना

चाहता हो, ऐसे पुरुषको प्राण जानेपर भी मैं नहीं छोड़ सकता; यह मेरा सदाका व्रत

है ॥ १२ ॥

इन्द्र उवाच

शुना दृष्टं क्रोधवशा हरन्ति

यद्दत्तमिष्टं विवृतमथो हुतं च ।

तस्माच्छुनस्त्यागमिमं कुरुष्व

शुनस्त्यागाद् प्राप्स्यसे देवलोकम् ॥ १३ ॥

इन्द्रने कहा—वीरवर! मनुष्य जो कुछ दान, यज्ञ, स्वाध्याय और हवन आदि पुण्यकर्म

करता है, उसपर यदि कुत्तेकी दृष्टि भी पड़ जाय तो उसके फलको क्रोधवश नामक राक्षस

हर ले जाते हैं; इसलिये इस कुत्तेका त्याग कर दो। कुत्तेको त्याग देनेसे ही तुम देवलोकमें

पहुँच सकोगे ॥ १३ ॥

त्यक्त्वा भ्रातॄन् दयितां चापि कृष्णां

प्राप्तो लोकः कर्मणा स्वेन वीर ।

श्वानं चैनं न त्यजसे कथं नु

त्यागं कृत्स्नं चास्थितो मुह्यसेऽद्य ॥ १४ ॥

वीर! तुमने अपने भाइयों तथा प्यारी पत्नी द्रौपदीका परित्याग करके अपने किये हुए

पुण्यकर्मोंके फलस्वरूप देवलोकको प्राप्त किया है। फिर तुम इस कुत्तेको क्यों नहीं त्याग