महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2508, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्वर्गं त्रिविष्टपं प्राप्य धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
दुर्योधनं श्रिया जुष्टं ददर्शासीनमासने ॥ ४ ॥
भ्राजमानमिवादित्यं वीरक्ष्म्याभिसंवृतम् ।
देवैर्भ्राजिष्णुभिः साध्यैः सहितं पुण्यकर्मभिः ॥ ५ ॥
स्वर्गलोकमें पहुँचकर धर्मराज युधिष्ठिरने देखा कि दुर्योधन स्वर्गीय शोभासे सम्पन्न हो तेजस्वी देवताओं तथा पुण्यकर्मा साध्यगणोंके साथ एक दिव्य सिंहासनपर बैठकर वीरोचित शोभासे संयुक्त हो सूर्यके समान देदीप्यमान हो रहा है ॥ ४-५ ॥
ततो युधिष्ठिरो दृष्ट्वा दुर्योधनममर्षितः ।
सहसा संनिवृत्तोऽभूच्छ्र्रियं दृष्ट्वा सुयोधने ॥ ६ ॥
दुर्योधनको ऐसी अवस्थामें देख उसे मिली हुई शोभा और सम्पत्तिका अवलोकन कर राजा युधिष्ठिर अमर्षसे भर गये और सहसा दूसरी ओर लौट पड़े ॥
ब्रुवन्नुच्चैर्वचस्तान् वै नाहं दुर्योधनेन वै ।
सहितः कामये लोकाँल्लुब्धेनादीर्घदर्शिना ॥ ७ ॥
यत्कृते पृथिवी सर्वा सुहृदो बान्धवास्तथा ।
हतास्माभिः प्रसह्वाजौ क्लिष्टैः पूर्वं महावने ॥ ८ ॥
द्रौपदी च सभामध्ये पाञ्चाली धर्मचारिणी ।
पर्याकृष्टानवद्याङ्गी पत्नी नो गुरुसंनिधौ ॥ ९ ॥
फिर उच्चस्वरसे उन सब लोगोंसे बोले—'देवताओ! जिसके कारण हमने अपने समस्त सुहृदों और बन्धुओंका हठपूर्वक युद्धमें संहार कर डाला और सारी पृथिवी उजाड़ डाली, जिसने पहले हमलोगोंको महान् वनमें भारी क्लेश पहुँचाया था तथा जो निर्दोष अंगोंवाली हमारी धर्मपरायणा पत्नी पाञ्चालराजकुमारी द्रौपदीको भरी सभामें गुरुजनोंके समीप घसीट लाया था, उस लोभी और अदूरदर्शी दुर्योधनके साथ रहकर मैं इन पुण्यलोकोंको पानेकी इच्छा नहीं रखता ॥ ७—९ ॥
अस्ति देवा न मे कामः सुयोधनमुदीक्षितुम् ।
तत्राहं गन्तुमिच्छामि यत्र ते भ्रातरो मम ॥ १० ॥
'देवगण! मैं दुर्योधनको देखना भी नहीं चाहता; मेरी तो वहीं जानेकी इच्छा है, जहाँ मेरे भाई हैं' ॥ १० ॥
नैवमित्यब्रवीत् तं तु नारदः प्रहसन्निव ।
स्वर्गे निवासे राजेन्द्र विरुद्धं चापि नश्यति ॥ ११ ॥
यह सुनकर नारदजी उनसे हँसते हुए-से बोले, 'नहीं-नहीं ऐसा न कहो; स्वर्गमें निवास करनेपर पहलेका वैर-विरोध शान्त हो जाता है ॥ ११ ॥
युधिष्ठिर महाबाहो मैवं वोचः कथंचन ।
दुर्योधनं प्रति नृपं शृणु चेदं वचो मम ॥ १२ ॥