भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2522, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2522

मरुतः सह शक्रेण वसवश्चाश्विनौ सह ।। ७ ।। साध्या रुद्रास्तथाऽऽदित्या ये चान्येऽपि दिवौकसः । सर्वे तत्र समाजग्मुः सिद्धाश्च परमर्षयः ।। ८ ।। यत्र राजा महातेजा धर्मपुत्रः स्थितोऽभवत् । इन्द्रके साथ मरुद्गण, वसुगण, दोनों अश्विनीकुमार, साध्यगण, रुद्रगण, आदित्यगण, अन्यान्य देवलोकवासी सिद्ध और महर्षि सभी उस स्थानपर आये जहाँ महातेजस्वी धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर खड़े थे ।।

ततः शक्रः सुरपतिः श्रिया परमया युतः ।। ९ ।। युधिष्ठिरमुवाचेदं सान्त्वपूर्वमिदं वचः । तदनन्तर उत्तम शोभासे सम्पन्न देवराज इन्द्रने युधिष्ठिरको सान्त्वना देते हुए इस प्रकार कहा ।। ९ १/२ ।।

युधिष्ठिर महाबाहो लोकाश्चाप्यक्षयास्तव ।। १० ।। एह्येहि पुरुषव्याघ्र कृतमेतावता विभो । सिद्धिः प्राप्ता महाबाहो लोकाश्चाप्यक्षयास्तव ।। ११ ।। ‘महाबाहु युधिष्ठिर! तुम्हें अक्षयलोक प्राप्त हुए हैं। पुरुषसिंह! प्रभो! अबतक जो हुआ सो हुआ। अब अधिक कष्ट उठानेकी आवश्यकता नहीं है। आओ हमारे साथ चलो। महाबाहो! तुम्हें बहुत बड़ी सिद्धि मिली है; साथ ही अक्षयलोकोंकी भी प्राप्ति हुई है ।। १०-११ ।।

न च मन्युस्त्वया कार्यः शृणु चेदं वचो मम । अवश्यं नरकस्तात द्रष्टव्यः सर्वराजभिः ।। १२ ।। ‘तात! तुम्हें जो नरक देखना पड़ा है इसके लिये क्रोध न करना। मेरी यह बात सुनो! समस्त राजाओंको निश्चय ही नरक देखना पड़ता है ।। १२ ।।

शुभानामशुभानां च द्वौ राशी पुरुषर्षभ । यः पूर्वं सुकृतं भुङ्क्ते पश्चान्निरयमेव सः ।। १३ ।। ‘पुरुषप्रवर! मनुष्यके जीवनमें शुभ और अशुभ कर्मोंकी दो राशियाँ सञ्चित होती हैं। जो पहले ही शुभ कर्म भोग लेता है उसे पीछे नरकमें ही जाना पड़ता है ।। १३ ।।

पूर्वं नरकभाग् यस्तु पश्चात् स्वर्गमुपैति सः । भूयिष्ठं पापकर्मा यः स पूर्वं स्वर्गमश्नुते ।। १४ ।। ‘परंतु जो पहले नरक भोग लेता है वह पीछे स्वर्गमें जाता है। जिसके पास पापकर्मोंका संग्रह अधिक है वह पहले ही स्वर्ग भोग लेता है ।। १४ ।।

तेन त्वमेवं गमितो मया श्रेयोऽर्थिना नृप । व्याजेन हि त्वया द्रोण उपतीर्णः सुतं प्रति ।। १५ ।। व्याजेनैव ततो राजन् दर्शितो नरकस्तव ।