महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2534, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंहैं जिन्होंने ब्रह्माजीकी आज्ञा पाकर योगबलसे इस पृथ्वीको धारण कर रखा है॥ २२-२३॥ यः स नारायणो नाम देवदेवः सनातनः। तस्यांशो वासुदेवस्तु कर्मणोऽन्ते विवेश ह॥ २४॥ वे जो नारायण नामसे प्रसिद्ध सनातन देवाधिदेव हैं उन्हींके अंश वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण थे, जो अवतारका कार्य पूरा करके पुनः अपने स्वरूपमें प्रविष्ट हो गये॥ षोडश स्त्रीसहस्राणि वासुदेवपरिग्रहः। अमज्जंस्ताः सरस्वत्यां कालेन जनमेजय॥ २५॥ जनमेजय! भगवान् श्रीकृष्णकी जो सोलह हजार स्त्रियाँ थीं, उन्होंने अवसर पाकर सरस्वती नदीमें कूदकर अपने प्राण दे दिये॥ २५॥ तत्र त्यक्त्वा शरीराणि दिवमारुरुहुः पुनः। ताश्चैवाप्सरसो भूत्वा वासुदेवमुपाविशन्॥ २६॥ वहाँ देहत्याग करनेके पश्चात् वे सब-की-सब पुनः स्वर्गलोकमें जा पहुँचीं और अप्सराएँ होकर पुनः भगवान् श्रीकृष्णकी सेवामें उपस्थित हो गयीं॥ २६॥ हतास्तस्मिन् महायुद्धे ये वीरास्तु महारथाः। घटोत्कचादयश्चैव देवान् यक्षांश्च भेजिरे॥ २७॥ इस प्रकार उस महाभारत नामक महायुद्धमें जो-जो वीर महारथी घटोत्कच आदि मारे गये थे वे देवताओं और यक्षोंके लोकोंमें गये॥ २७॥ दुर्योधनसहायाश्च राक्षसाः परिकीर्तिताः। प्राप्तास्ते क्रमशो राजन् सर्वलोकाननुत्तमान्॥ २८॥ राजन्! जो दुर्योधनके सहायक थे, वे सब-के-सब राक्षस बताये गये हैं। उन्हें क्रमशः सभी उत्तम लोकोंकी प्राप्ति हुई॥ २८॥ भवनं च महेन्द्रस्य कुबेरस्य च धीमतः। वरुणस्य तथा लोकान् विविशुः पुरुषर्षभाः॥ २९॥ ये श्रेष्ठ पुरुष क्रमशः देवराज इन्द्रके, बुद्धिमान् कुबेरके तथा वरुण देवताके लोकोंमें गये॥ २९॥ एतत् ते सर्वमाख्यातं विस्तरेण महाद्युते। कुरूणां चरितं कृत्स्नं पाण्डवानां च भारत॥ ३०॥ महातेजस्वी भरतनन्दन! यह सारा प्रसंग—कौरवों और पाण्डवोंका सम्पूर्ण चरित्र तुम्हें विस्तारके साथ बताया गया॥ ३०॥
सौतिरुवाच एतच्छ्रुत्वा द्विजश्रेष्ठाः स राजा जनमेजयः।