भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

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पृष्ठ 2537

अष्टादशपुराणानां कर्तुर्वेदमहोदधेः ।। ४७ ।। अठारह पुराणोंके निर्माता और वेदविद्याके महासागर महात्मा व्यास मुनिका यह सिंहनाद सुनो। वे कहते हैं—'अठारह पुराण, सम्पूर्ण धर्मशास्त्र और छहों अंगोंसहित चारों वेद एक ओर तथा केवल महाभारत दूसरी ओर, यह अकेला ही उन सबके बराबर है' ।। ४६-४७ ।।

त्रिभिर्वर्षैरिदं पूर्णं कृष्णद्वैपायनः प्रभुः । अखिलं भारतं चेदं चकार भगवान् मुनिः ।। ४८ ।। मुनिवर भगवान् श्रीकृष्णद्वैपायनने तीन वर्षोंमें इस सम्पूर्ण महाभारतको पूर्ण किया था ।। ४८ ।।

आकर्ण्य भक्त्या सततं जयाख्यं भारतं महत् । श्रीश्च कीर्तिस्तथा विद्या भवन्ति सहिताः सदा ।। ४९ ।। जो जय नामक इस महाभारत इतिहासको सदा भक्तिपूर्वक सुनता रहता है उसके यहाँ श्री, कीर्ति और विद्या तीनों साथ-साथ रहती हैं ।। ४९ ।।

धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ । यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न कुत्रचित् ।। ५० ।। भरतश्रेष्ठ! धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके विषयमें जो कुछ महाभारतमें कहा गया है, वही अन्यत्र है। जो इसमें नहीं है, वह कहीं नहीं है ।। ५० ।।

जयो नामेतिहासोऽयं श्रोतव्यो मोक्षमिच्छता । ब्राह्मणेन च राज्ञा च गर्भिण्या चैव योषिता ।। ५१ ।। मोक्षकी इच्छा रखनेवाले ब्राह्मणको, राज्य चाहनेवाले क्षत्रियको तथा उत्तम पुत्रकी इच्छा रखनेवाली गर्भिणी स्त्रीको भी इस जय नामक इतिहासका श्रवण करना चाहिये ।। ५१ ।।

स्वर्गकामो लभेत् स्वर्गं जयकामो लभेज्जयम् । गर्भिणी लभते पुत्रं कन्यां वा बहुभागिनीम् ।। ५२ ।। महाभारतका श्रवण या पाठ करनेवाला मनुष्य यदि स्वर्गकी इच्छा करे तो उसे स्वर्ग मिलता है और युद्धमें विजय पाना चाहे तो विजय मिलती है। इसी प्रकार गर्भिणी स्त्रीको महाभारतके श्रवणसे सुयोग्य पुत्र या परम सौभाग्यशालिनी कन्याकी प्राप्ति होती है ।। ५२ ।।

अनागतश्च मोक्षश्च कृष्णद्वैपायनः प्रभुः । संदर्भं भारतस्यास्य कृतवान् धर्मकाम्यया ।। ५३ ।। नित्यसिद्ध मोक्षस्वरूप भगवान् कृष्णद्वैपायनने धर्मकी कामनासे इस महाभारतसंदर्भकी रचना की है ।।

षष्टिं शतसहस्राणि चकारान्यां स संहिताम् ।