भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 27, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 27

न स पश्यति दुष्टात्मा त्वामद्य पतितं क्षितौ । अतः श्रेयो मृतं मन्ये नेह जीवितमात्मनः ॥ ११ ॥ वह दुष्टात्मा आज आपको इस तरह भूमिपर पड़ा हुआ नहीं देख रहा है, अतः उसकी मृत्युको ही मैं यहाँ श्रेष्ठ मानता हूँ; किन्तु अपने इस जीवनको नहीं ॥ ११ ॥

अहं हि समरे वीर गमितः शत्रुभिः क्षयम् । अभविष्यं यदि पुरा सह भ्रातृभिरच्युत ॥ १२ ॥ न त्वामेवं सुदुःखार्तमद्राक्षं सायकार्दितम् । अपनी मर्यादासे कभी नीचे न गिरनेवाले वीरवर! यदि भाइयोंसहित मैं शत्रुओंद्वारा पहले ही युद्धमें मार डाला गया होता तो आपको इस प्रकार सायकोंसे पीड़ित और अत्यन्त दुःखसे आतुर अवस्थामें नहीं देखता ॥ १२ १/२ ॥

नूनं हि पापकर्मणो धात्रा सृष्टाः स्म हे नृप ॥ १३ ॥ अन्यस्मिन्नपि लोके वै यथा मुच्येम किल्बिषात् । तथा प्रशाधि मां राजन् मम चेदिच्छसि प्रियम् ॥ १४ ॥ नरेश्वर! निश्चय ही विधाताने हमें पापी ही रचा है। राजन्! यदि आप मेरा प्रिय करना चाहते हैं तो मुझे ऐसा उपदेश दीजिये, जिससे परलोकमें भी मुझे इस पापसे छुटकारा मिल सके ॥ १३-१४ ॥

भीष्म उवाच

परतन्त्रं कथं हेतुमात्मानमनुपश्यसि । कर्मणां हि महाभाग सूक्ष्मं ह्येतदतीन्द्रियम् ॥ १५ ॥ भीष्मजी कहते हैं—महाभाग! तुम तो सदा परतन्त्र हो (काल, अदृष्ट और ईश्वरके अधीन हो), फिर अपनेको शुभाशुभ कर्मोंका कारण क्यों समझते हो? वास्तवमें कर्मोंका कारण क्या है, यह विषय अत्यन्त सूक्ष्म तथा इन्द्रियोंकी पहुँचसे बाहर है ॥ १५ ॥

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । संवादं मृत्युगौतम्योः काललुब्धकपन्नगैः ॥ १६ ॥ इस विषयमें विद्वान् पुरुष गौतमी ब्राह्मणी, व्याध, सर्प, मृत्यु और कालके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ १६ ॥

गौतमी नाम कौन्तेय स्थविरा शमसंयुता । सर्पेण दष्टं स्वं पुत्रमपश्यद्गतचेतनम् ॥ १७ ॥ कुन्तीनन्दन! पूर्वकालमें गौतमी नामवाली एक बूढ़ी ब्राह्मणी थी, जो शान्तिके साधनमें संलग्न रहती थी। एक दिन उसने देखा, उसके इकलौते बेटेको साँपने डँस लिया और उसकी चेतनाशक्ति लुप्त हो गयी ॥

अथ तं स्नायुपाशेन बद्ध्वा सर्पममर्षितः ।