महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसर्वार्तियुक्ता गुरवो भवन्ति । स्वस्थस्यैते तूपदेशा भवन्ति तस्मात् क्षुद्रं सर्पमेनं हनिष्ये ॥ २४ ॥ **व्याधने कहा—**गुण और अवगुणको जाननेवाली देवि! मैं जानता हूँ कि बड़े-बूढ़े लोग किसी भी प्राणीको कष्टमें पड़ा देख इसी तरह दुःखी हो जाते हैं। परंतु ये उपदेश तो स्वस्थ पुरुषके लिये हैं (दुःखी मनुष्यके मनपर इनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता)। अतः मैं इस नीच सर्पको अवश्य मार डालूँगा ॥ २४ ॥ शमार्थिनः कालगतिं वदन्ति सद्यः शुचं त्वर्थविदस्त्यजन्ति । श्रेयःक्षयं शोचति नित्यमोहात् तस्माच्छुचं मुञ्च हते भुजङ्गे ॥ २५ ॥ शान्ति चाहनेवाले पुरुष कालकी गति बताते हैं (अर्थात् कालने ही इसका नाश कर दिया है, ऐसा कहते हुए शोकका त्याग करके संतोष धारण करते हैं)। परंतु जो अर्थवेत्ता हैं—बदला लेना जानते हैं, वे शत्रु का नाश करके तुरंत ही शोक छोड़ देते हैं। दूसरे लोग श्रेयका नाश होनेपर मोहवश सदा उसके लिये शोक करते रहते हैं; अतः इस शत्रुभूत सर्पके मारे जानेपर तुम भी तत्काल ही अपने पुत्र-शोकको त्याग देना ॥ २५ ॥
गौतम्युवाच
आर्तिर्नैवं विद्यतेऽस्मद्विधानां धर्मात्मानः सर्वदा सज्जना हि । नित्यायस्तो बालकोऽप्यस्य तस्मा- दीशे नाहं पन्नगस्य प्रमाथे ॥ २६ ॥ **गौतमी बोली—**अर्जुनक! हम-जैसे लोगोंको कभी किसी तरहकी हानिसे भी पीड़ा नहीं होती। धर्मात्मा सज्जन पुरुष सदा धर्ममें ही लगे रहते हैं। मेरा यह बालक सर्वथा मरनेहीवाला था; इसलिये मैं इस सर्पको मारनेमें असमर्थ हूँ ॥ २६ ॥ न ब्राह्मणानां कोपोऽस्ति कुतः कोपाच्च यातनाम् । मार्दवात् क्षम्यतां साधो मुच्यतामेष पन्नगः ॥ २७ ॥ ब्राह्मणोंको क्रोध नहीं होता; फिर वे क्रोधवश दूसरोंको पीड़ा कैसे दे सकते हैं; अतः साधो! तू भी कोमलताका आश्रय लेकर इस सर्पके अपराधको क्षमा कर और इसे छोड़ दे ॥ २७ ॥
लुब्धक उवाच
हत्वा लाभः श्रेय एवाव्ययः स्या- ल्लभ्यो लाभ्यः स्याद् बलिभ्यः प्रशस्तः ।