महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयद्येष समयः सर्वः साध्यतां तत्र गम्यताम् ॥ २५ ॥ उसे देखकर लौटनेपर ही तुम मेरी पुत्रीका पाणिग्रहण कर सकोगे। यदि यह सारी शर्त स्वीकार हो तो इसे पूरी करनेमें लग जाओ और अभी वहाँकी यात्रा आरम्भ कर दो ॥ २५ ॥
अष्टावक्र उवाच
तथास्तु साधयिष्यामि तत्र यास्याम्यसंशयम् ।
यत्र त्वं वदसे साधो भवान् भवतु सत्यवाक् ॥ २६ ॥
अष्टावक्र बोले— ऐसा ही होगा, मैं यह शर्त पूरी करूँगा। श्रेष्ठ पुरुष! आप जहाँ कहते हैं वहाँ अवश्य जाऊँगा। आपकी वाणी सत्य हो ॥ २६ ॥
भीष्म उवाच
ततोऽगच्छत् स भगवानुत्तरामुत्तरां दिशम् ।
हिमवन्तं गिरिश्रेष्ठं सिद्धचारणसेवितम् ॥ २७ ॥
स गत्वा द्विजशार्दूलो हिमवन्तं महागिरिम् ।
अभ्यगच्छन्नदीं पुण्यां बाहुदां धर्मशालिनीम् ॥ २८ ॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! तदनन्तर भगवान् अष्टावक्र उत्तरोत्तर दिशाकी ओर चल दिये। सिद्धों और चारणोंसे सेवित गिरिश्रेष्ठ महापर्वत हिमालयपर पहुँचकर वे श्रेष्ठ द्विज धर्मसे शोभा पानेवाली पुण्यमयी बाहुदा नदीके तटपर गये ॥ २७-२८ ॥
अशोके विमले तीर्थे स्नात्वा वै तर्प्य देवताः ।
तत्र वासाय शयने कौशे सुखमुवास ह ॥ २९ ॥
वहाँ निर्मल अशोक तीर्थमें स्नान करके देवताओंका तर्पण करनेके पश्चात् उन्होंने कुशकी चटाईपर सुखपूर्वक निवास किया ॥ २९ ॥
ततो रात्र्यां व्यतीतायां प्रातरुत्थाय स द्विजः ।
स्नात्वा प्रादुश्चकाराग्निं स्तुत्वा चैनं प्रधानतः ॥ ३० ॥
रुद्राणीं रुद्रमासाद्य ह्रदे तत्र समाश्वसत् ।
विश्रान्तश्च समुत्थाय कैलासमभितो ययौ ॥ ३१ ॥
तदनन्तर रात बीतनेपर वे द्विज प्रातःकाल उठे और उन्होंने स्नान करके अग्निदेवको प्रज्वलित किया। फिर मुख्य-मुख्य वैदिक मन्त्रोंसे अग्निदेवकी स्तुति करके ‘रुद्राणी रुद्र’ नामक तीर्थमें गये और वहाँ सरोवरके तटपर कुछ कालतक विश्राम करते रहे। विश्रामके पश्चात् उठकर वे कैलासकी ओर चल दिये ॥ ३०-३१ ॥
सोऽपश्यत् काञ्चनद्वारं दीप्यमानमिव श्रिया ।
मन्दाकिनीं च नलिनीं धनदस्य महात्मनः ॥ ३२ ॥