भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 299, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 299

उनकी ऐसी स्थिति देख वह बहुत दुखी हो गयी और मुनिसे इस प्रकार बोली—'ब्रह्मन्! पुरुषको अपने समीप पाकर उसके काम-व्यवहारको छोड़कर और किसी बातसे स्त्रीको धैर्य नहीं रहता। मैं कामसे मोहित होकर आपकी सेवामें आयी हूँ। आप मुझे स्वीकार कीजिये। ब्रह्मर्षे! आप प्रसन्न हों और मेरे साथ समागम करें।।

उपगूह च मां विप्र कामार्तां भृशं त्वयि । एतद्धि तव धर्मात्मंस्तपसः पूज्यते फलम् ॥ ८२ ॥

'विप्रवर! आप मेरा आलिंगन कीजिये। मैं आपके प्रति अत्यन्त कामातुर हूँ। धर्मात्मन्! यही आपकी तपस्याका प्रशस्त फल है ॥ ८२ ॥

प्रार्थितं दर्शनादेव भजमानां भजस्व माम् । मम चेदं धनं सर्वं यच्चान्यदपि पश्यसि ॥ ८३ ॥ प्रभुस्त्वं भव सर्वत्र मयि चैव न संशयः । सर्वान् कामान् विधास्यामि रमस्व सहितो मया ॥ ८४ ॥

'मैं आपको देखते ही आपके प्रति अनुरक्त हो गयी हूँ; अतः आप मुझ सेविकाको अपनाइये। मेरा यह सारा धन तथा और जो कुछ आप देख रहे हैं, उस सबके तथा मेरे भी आप ही स्वामी हैं—इसमें संशय नहीं है। आप मेरे साथ रमण कीजिये। मैं आपकी समस्त कामनाएँ पूर्ण करूँगी ॥ ८३-८४ ॥

रमणीये वने विप्र सर्वकामफलप्रदे । त्वद्वशाहं भविष्यामि रंस्यसे च मया सह ॥ ८५ ॥

'ब्रह्मन्! सम्पूर्ण मनोवाञ्छित फलको देनेवाले इस रमणीय वनमें मैं आपके अधीन होकर रहूँगी। आप मेरे साथ रमण कीजिये ॥ ८५ ॥

सर्वान् कामानुपाश्नीमो ये दिव्या ये च मानुषाः । नातः परं हि नारीणां विद्यते च कदाचन ॥ ८६ ॥ यथा पुरुषसंसर्गः परमेतद्धि नः फलम् ।

'हमलोग यहाँ दिव्य और मनुष्यलोक-सम्बन्धी सम्पूर्ण भोगोंका उपभोग करेंगे। स्त्रियोंके लिये पुरुषसंसर्ग जितना प्रिय है, उससे बढ़कर दूसरा कोई फल कदापि प्रिय नहीं होता। यही हमारे लिये सर्वोत्तम फल है ।।

आत्मच्छन्देन वर्तन्ते नार्यो मन्मथचोदिताः ॥ ८७ ॥ न च दह्यन्ति गच्छन्त्यः सुतप्तैरपि पांसुभिः ।

'कामसे प्रेरित हुई नारियाँ सदा अपनी इच्छाके अनुसार बर्ताव करती हैं। कामसे संतप्त होनेपर वे तपी हुई धूलमें भी चलती हैं; परंतु इससे उनके पैर नहीं जलते' ॥ ८७ ॥

अष्टावक्र उवाच