भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 317, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 317

मार्कण्डेय उवाच

केन मङ्गलकृत्येषु विनियुज्यन्ति कन्यकाः ।
एतदिच्छामि विज्ञातुं तत्त्वेनेह महामुने ॥
**मार्कण्डेयजीने पूछा—**महामुने! किस कारणसे कन्याओंको मांगलिक कर्मोंमें नियुक्त किया जाता है? मैं इस बातको यथार्थरूपसे जानना चाहता हूँ ॥

नारद उवाच

नित्यं निवसते लक्ष्मीः कन्यकासु प्रतिष्ठिता ।
शोभना शुभयोग्या च पूज्या मङ्गलकर्मसु ॥
**नारदजीने कहा—**कन्याओंमें सदा लक्ष्मी निवास करती हैं। वे उनमें नित्य प्रतिष्ठित होती हैं; इसलिये प्रत्येक कन्या शोभासम्पन्न, शुभ कर्मके योग्य तथा मंगल कर्मोंमें पूजनीय होती है ॥

आकरस्थं यथा रत्नं सर्वकामफलोपगम् ।
तथा कन्या महालक्ष्मीः सर्वलोकस्य मङ्गलम् ॥
जैसे खानमें स्थित हुआ रत्न सम्पूर्ण कामनाओं एवं फलोंकी प्राप्ति करानेवाला होता है, उसी प्रकार महालक्ष्मीस्वरूपा कन्या सम्पूर्ण जगत्‌के लिये मंगल-कारिणी होती है ॥

एवं कन्या परा लक्ष्मी रतिस्तोषश्च देहिनाम् ।
महाकुलानां चारित्रं वृत्तेन निकषोपलम् ॥
इस तरह कन्याको लक्ष्मीका सर्वोत्कृष्ट रूप जानना चाहिये। उससे देहधारियोंको सुख और संतोषकी प्राप्ति होती है। वह अपने सदाचारके द्वारा उच्च कुलोंके चरित्रकी कसौटी समझी जाती है ॥

आनयित्वा स्वकाद् वर्णात् कन्यकां यो भजेन्नरः ।
दातारं हव्यकव्यानां पुत्रकं या प्रसूयते ॥
जो मनुष्य अपने ही वर्णकी कन्याको विवाहके द्वारा लाकर उसे पत्नीके स्थानपर प्रतिष्ठित करता है, उसकी वह साध्वी पत्नी हव्य-कव्य प्रदान करनेवाले पुत्रको जन्म देती है ॥

साध्वी कुलं वर्धयति साध्वी पुष्टिर्गृहे परा ।
साध्वी लक्ष्मी रतिः साक्षात् प्रतिष्ठा संततिस्तथा ॥
साध्वी स्त्री कुलकी वृद्धि करती है। साध्वी स्त्री घरमें परम पुष्टिरूप है तथा साध्वी स्त्री घरकी लक्ष्मी है, रति है, मूर्तिमती प्रतिष्ठा है तथा संतान-परम्पराकी आधार है ॥

मार्कण्डेय उवाच

कानि तीर्थानि भगवन् नृणां देहाश्रितानि वै ।
तानि वै शंस भगवन् याथातथ्येन पृच्छतः ॥