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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 320, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 320

**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! जो केवल उत्कृष्ट श्रद्धासे ही पवित्र होकर ब्राह्मणको हव्य-कव्य तथा अन्य वस्तुका दान देता है, उसे अन्य प्रकारकी पवित्रता न होनेके कारण किस दोषकी प्राप्ति होती है? ।। ३ ।।

भीष्म उवाच

श्रद्धापूतो नरस्तात दुर्दान्तोऽपि न संशयः । पूतो भवति सर्वत्र किमुत त्वं महाद्युते ।। ४ ।। **भीष्मजीने कहा—**तात! मनुष्य जितेन्द्रिय न होनेपर भी केवल श्रद्धामात्रसे पवित्र हो जाता है—इसमें संशय नहीं है। महातेजस्वी नरेश! श्रद्धापूत मनुष्य सर्वत्र पवित्र होता है, फिर तुम-जैसे धर्मात्माके पवित्र होनेमें तो संदेह ही क्या है? ।। ४ ।।

युधिष्ठिर उवाच

न ब्राह्मणं परीक्षेत दैवेषु सततं नरः । कव्यप्रदाने तु बुधाः परीक्ष्यं ब्राह्मणं विदुः ।। ५ ।। **युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! विद्वानोंका कहना है कि देवकार्यमें कभी ब्राह्मणकी परीक्षा न करे, किंतु श्राद्धमें अवश्य उसकी परीक्षा करे; इसका क्या कारण है? ।। ५ ।।

भीष्म उवाच

न ब्राह्मणः साधयते हव्यं दैवात् प्रसिद्ध्यति । देवप्रसादादिज्यन्ते यजमानैर्न संशयः ।। ६ ।। **भीष्मजीने कहा—**बेटा! यज्ञ-होम आदि देवकार्यकी सिद्धि ब्राह्मणके अधीन नहीं है, वह दैवसे सिद्ध होता है। देवताओंकी कृपासे ही यजमान यज्ञ करते हैं। इसमें संशय नहीं है ।। ६ ।।

ब्राह्मणान् भरतश्रेष्ठ सततं ब्रह्मवादिनः । मार्कण्डेयः पुरा प्राह इति लोकेषु बुद्धिमान् ।। ७ ।। भरतश्रेष्ठ! बुद्धिमान् मार्कण्डेयजीने बहुत पहलेसे ही यह बता रखा है कि श्राद्धमें सदा वेदवेत्ता ब्राह्मणोंको ही निमन्त्रित करना चाहिये (क्योंकि उसकी सिद्धि सुपात्र ब्राह्मणके ही अधीन है) ।। ७ ।।

युधिष्ठिर उवाच

अपूर्वोऽप्यथवा विद्वान् सम्बन्धी वा यथा भवेत् । तपस्वी यज्ञशीलो वा कथं पात्रं भवेत् तु सः ।। ८ ।। **युधिष्ठिरने पूछा—**जो अपरिचित, विद्वान्, सम्बन्धी, तपस्वी अथवा यज्ञशील हों, इनमेंसे कौन किस प्रकारके गुणोंसे सम्पन्न होनेपर श्राद्ध एवं दानका उत्तम पात्र हो सकता है? ।। ८ ।।