भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 322, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 322

करता है, वह धर्मसे भ्रष्ट होकर सत्यका पालन नहीं करता; अतः उसे नाशवान् लोकोंकी प्राप्ति होती है ॥ १३ ॥

मार्कण्डेय उवाच

अश्वमेधसहस्रं च सत्यं च तुलया धृतम् ।
नाभिजानामि यद्यस्य सत्यस्यार्धमवाप्नुयात् ॥ १४ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं— यदि तराजूके एक पलड़ेमें एक हजार अश्वमेध-यज्ञको और दूसरेमें सत्यको रखकर तौला जाय तो भी न जाने वे सारे अश्वमेध-यज्ञ इस सत्यके आधेके बराबर भी होंगे या नहीं? ॥ १४ ॥

भीष्म उवाच

इत्युक्त्वा ते जग्मुराशु चत्वारोऽमिततेजसः ।
पृथिवी काश्यपोऽग्निश्च प्रकृष्टायुश्च भार्गवः ॥ १५ ॥
भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! इस प्रकार अपना मत प्रकट करके वे चारों अमिततेजस्वी व्यक्ति—पृथ्‍वी, काश्यप, अग्नि और मार्कण्डेय शीघ्र ही चले गये ॥ १५ ॥

युधिष्ठिर उवाच

यदि ते ब्राह्मणा लोके व्रतिनो भुञ्जते हविः ।
दत्तं ब्राह्मणकामाय कथं तत् सुकृतं भवेत् ॥ १६ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! यदि ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मण श्राद्धमें हविष्यान्नका भोजन करते हैं तो श्रेष्ठ ब्राह्मणकी कामनासे उन्हें दिया हुआ दान कैसे सफल हो सकता है? ॥ १६ ॥

भीष्म उवाच

आदिष्टिनो ये राजेन्द्र ब्राह्मणा वेदपारगाः ।
भुञ्जते ब्रह्मकामाय व्रतलुप्ता भवन्ति ते ॥ १७ ॥
भीष्मजीने कहा— राजेन्द्र! (जिन्हें गुरुने नियत वर्षोंतक ब्रह्मचर्य-व्रत पालन करनेका आदेश दे रखा है वे आदिष्टी कहलाते हैं।) ऐसे वेदके पारङ्गत आदिष्टी ब्राह्मण यदि यजमानकी ब्राह्मणको दान देनेकी इच्छापूर्तिके लिये श्राद्धमें भोजन करते हैं तो उनका अपना ही व्रत नष्ट हो जाता है (इससे दाताका दान दूषित नहीं होता है)* ॥ १७ ॥

युधिष्ठिर उवाच

अनेकान्तं बहुद्वारं धर्ममाहुर्मनीषिणः ।
किंनिमित्तं भवेदत्र तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १८ ॥