भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 331, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 331

राजन्! जो ब्राह्मण उन्नत होकर तत्काल ही अवनत और अवनत होकर उन्नत हो जाता है एवं किसी जीवकी हिंसा नहीं करता है, वह थोड़ा दोषी हो तो भी उसे श्राद्धमें निमन्त्रण देना उचित है ॥ २८ ॥

अकल्कको ह्यतर्कश्च ब्राह्मणो भरतर्षभ ।
संसर्गे भैक्ष्यवृत्तिश्च स राजन् केतनक्षमः ॥ २९ ॥
भरतश्रेष्ठ! जो दम्भरहित, व्यर्थ तर्क-वितर्क न करनेवाला तथा सम्पर्क स्थापित करनेके योग्य घरसे भिक्षा लेकर जीवन-निर्वाह करनेवाला है, वह ब्राह्मण निमन्त्रण पानेका अधिकारी है ॥ २९ ॥

अव्रती कितवः स्तेनः प्राणिविक्रयिको वणिक् ।
पश्चाच्च पीतवान् सोमं स राजन् केतनक्षमः ॥ ३० ॥
राजन्! जो व्रतहीन, धूर्त, चोर, प्राणियोंका क्रय-विक्रय करनेवाला तथा वणिक्-वृत्तिसे जीविका चलानेवाला होकर भी पीछे यज्ञका अनुष्ठान करके उसमें सोमरसका पान कर चुका है, वह भी निमन्त्रण पानेका अधिकारी है ॥ ३० ॥

अर्जयित्वा धनं पूर्वं दारुणैरपि कर्मभिः ।
भवेत् सर्वातिथिः पश्चात् स राजन् केतनक्षमः ॥ ३१ ॥
नरेश्वर! जो पहले कठोर कर्मोंद्वारा भी धनका उपार्जन करके पीछे सब प्रकारसे अतिथियोंका सेवक हो जाता है, वह श्राद्धमें बुलाने योग्य है ॥ ३१ ॥

ब्रह्मविक्रयनिर्दिष्टं स्त्रिया यच्चार्जितं धनम् ।
अदेयं पितृविप्रेभ्यो यच्च क्लैब्यादुपार्जितम् ॥ ३२ ॥
जो धन वेद बेचकर लाया गया हो या स्त्रीकी कमाईसे प्राप्त हुआ हो अथवा लोगोंके सामने दीनता दिखाकर माँग लाया गया हो, वह श्राद्धमें ब्राह्मणोंको देने योग्य नहीं है ॥ ३२ ॥

क्रियमाणेऽपवर्गे च यो द्विजो भरतर्षभ ।
न व्याहरति यद्युक्तं तस्याधर्मो गवानृतम् ॥ ३३ ॥
भरतश्रेष्ठ! जो ब्राह्मण श्राद्धकी समाप्ति होनेपर ‘अस्तु स्वधा’ आदि तत्कालोचित वचनोंका प्रयोग नहीं करता है, उसे गायकी झूठी शपथ खानेका पाप लगता है ॥

श्राद्धस्य ब्राह्मणः कालः प्राप्तं दधि घृतं तथा ।
सोमक्षयश्च मांसं च यदारण्यं युधिष्ठिर ॥ ३४ ॥
युधिष्ठिर! जिस दिन भी सुपात्र ब्राह्मण, दही, घी, अमावास्या तिथि तथा जंगली कन्द, मूल और फलोंका गूदा प्राप्त हो जाय, वही श्राद्धका उत्तम काल है ॥ ३४ ॥

(मुहूर्तानां त्रयं पूर्वमह्नः प्रातरिति स्मृतम् ।
जपध्यानादिभिस्तस्मिन् विप्रैः कार्यं शुभव्रतम् ॥

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