महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 335, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंहोकर दाताके पास आते हैं तो उन्हें दिया हुआ दान महान् फलकी प्राप्ति करानेवाला होता है ।। ५० ।। तद्भक्तास्तद्गृहा राजंस्तद्वलास्तदपाश्रयाः । अर्थिनश्च भवन्त्यर्थे तेषु दत्तं महाफलम् ॥ ५१ ॥ नरेश्वर! जो सदाचारके ही भक्त हैं, जिनके घरमें सदाचारका ही पालन होता है, जिन्हें सदाचारका ही बल है तथा जिन्होंने सदाचारका ही आश्रय ले रखा है, वे यदि आवश्यकता पड़नेपर याचना करते हैं तो उनको दिया हुआ दान महान् फलकी प्राप्ति करानेवाला होता है ।। ५१ ।। तस्करेभ्यः परेभ्यो वा ये भयार्ता युधिष्ठिर । अर्थिनो भोक्तुमिच्छन्ति तेषु दत्तं महाफलम् ॥ ५२ ॥ युधिष्ठिर! चोरों और शत्रुओंके भयसे पीड़ित होकर आये हुए जो याचक केवल भोजन चाहते हैं उन्हें दिया हुआ दान महान् फलकी प्राप्ति करानेवाला होता है ।। ५२ ।। अकल्ककस्य विप्रस्य रौक्ष्यात् करकृतात्मनः । वटवो यस्य भिक्षन्ति तेभ्यो दत्तं महाफलम् ॥ ५३ ॥ जिसके मनमें किसी तरहका कपट नहीं है, अत्यन्त दरिद्रताके कारण जिसके हाथमें अन्न आते ही उसके भूखे बच्चे 'मुझे दो,' 'मुझे दो' ऐसा कहकर माँगने लगते हैं; ऐसे निर्धन ब्राह्मण और उसके उन बच्चोंको दिया हुआ दान महान् फलदायक होता है ।। ५३ ।। हृतस्वा हृतदाराश्च ये विप्रा देशसम्प्लवे । अर्थार्थमभिगच्छन्ति तेभ्यो दत्तं महाफलम् ॥ ५४ ॥ देशमें विप्लव होनेके समय जिनके धन और स्त्रियाँ छिन गयी हों; वे ब्राह्मण यदि धनकी याचनाके लिये आयें तो उन्हें दिया हुआ दान महान् फलदायक होता है ।। ५४ ।। व्रतिनो नियमस्थाश्च ये विप्राः श्रुतसम्मताः । तत्समाप्त्यर्थमिच्छन्ति तेभ्यो दत्तं महाफलम् ॥ ५५ ॥ जो व्रत और नियममें लगे हुए ब्राह्मण वेद-शास्त्रोंकी सम्मतिके अनुसार चलते हैं और अपने व्रतकी समाप्तिके लिये धन चाहते हैं, उन्हें देनेसे महान् फलकी प्राप्ति होती है ।। ५५ ।। अत्युक्रान्ताश्च धर्मेषु पाषण्डसमयेषु च । कृशप्राणाः कृशधनास्तेभ्यो दत्तं महाफलम् ॥ ५६ ॥ जो पाखण्डियोंके धर्मसे दूर रहते हैं, जिनके पास धनका अभाव है तथा जो अन्न न मिलनेके कारण दुर्बल हो गये हैं, उनको दिया हुआ दान महान् फलदायक होता है ।। ५६ ।। (व्रतानां पारणार्थाय गुर्वर्थे यज्ञदक्षिणाम् । निवेशार्थं च विद्वांसस्तेषां दत्तं महाफलम् ।।